Netaji Subhas Chandra Bose : फीचर डेस्क : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम अद्वितीय साहस, रणनीति और देशभक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनकी 129वीं जयंती के अवसर पर देश एक बार फिर उस क्रांतिकारी नेता को स्मरण कर रहा है, जिसने आज़ादी के लिए न केवल अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपनी पहचान तक बदल डाली। नेताजी से जुड़ी ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जो उनके अदम्य साहस और सूझबूझ को दर्शाती हैं। इन्हीं में से एक है वह प्रसंग, जब वे अंग्रेजों की कड़ी निगरानी से बचते हुए ‘मौलवी जियाउद्दीन’ बन गए थे।

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जानें क्यों बदली अपनी पहचान
सुभाष चंद्र बोस केवल एक नाम नहीं थे, बल्कि वह एक विचार और आंदोलन थे। 1941 में जब अंग्रेज सरकार ने उन्हें कोलकाता स्थित उनके आवास में नजरबंद कर दिया, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों की कड़ी निगरानी के बावजूद नेताजी ने साहसिक योजना बनाई और रात के अंधेरे में पहरे को चकमा देकर घर से निकलने में सफल रहे। इस दौरान उन्होंने मौलवी जियाउद्दीन का वेश धारण किया, ताकि किसी को संदेह न हो और वे सुरक्षित रूप से भारत से बाहर निकल सकें।
Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti 2026 : मौलवी जियाउद्दीन बनकर कोलकाता से पेशावर तक का सफर
मौलवी जियाउद्दीन के रूप में नेताजी ने कोलकाता से कालका मेल के जरिए दिल्ली की यात्रा की। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दिल्ली अंग्रेजों की सत्ता का केंद्र था, जहां खुफिया एजेंसियों की सक्रियता बेहद अधिक थी। ऐसे में दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन बदलना एक बड़ा जोखिम था। बावजूद इसके, नेताजी ने पूरी सतर्कता के साथ फ्रंटियर मेल पकड़ी, जो उन्हें पेशावर ले जाने वाली थी। 19 जनवरी 1941 की शाम जब ट्रेन पेशावर छावनी स्टेशन पर पहुंची, तो एक धार्मिक मुस्लिम और पठानी वेशभूषा में उतरे व्यक्ति को देखकर वहां मौजूद फॉरवर्ड ब्लॉक के फ्रंटियर नेता अकबर शाह तुरंत समझ गए कि यही सुभाष बाबू हैं।
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अकबर शाह पहले से ही नेताजी की मदद के लिए तैयार थे। उन्होंने नेताजी की पहचान उजागर किए बिना उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इसके बाद नेताजी को पेशावर के ताजमहल होटल में ठहराया गया और फिर आबाद खान के घर ले जाया गया, जहां उन्हें स्थानीय संस्कृति, पश्तो भाषा और कबीलाई जीवनशैली से परिचित कराया गया। सुरक्षा के लिहाज से उनका रूप गूंगे-बहरे पठान का बना दिया गया, ताकि किसी भी प्रकार का संदेह उत्पन्न न हो।

Netaji Subhas Chandra Bose Jayanti 2026 : ये भी रहे नेताजी के नाम
मौलवी जियाउद्दीन ही नहीं, नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बदली। जर्मनी पहुंचने पर उन्होंने ऑरलैंडो मजोटा नाम का उपयोग किया। इसके बाद जब वे पनडुब्बी के जरिए जापान गए, तो उन्होंने कमांडर मक्सुदा के नाम से यात्रा की। युद्धकाल में पनडुब्बी से यात्रा करना अत्यंत जोखिम भरा था, लेकिन नेताजी के लिए देश की आज़ादी सर्वोपरि थी।
इतिहास में अमर है नेताजी का साहस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह साहसिक जीवन प्रसंग यह दर्शाता है कि वे केवल विचारों के नेता नहीं थे, बल्कि ज़मीनी स्तर पर संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी थे। पहचान बदलकर दुश्मन को भ्रमित करना उनकी रणनीतिक कुशलता का उदाहरण है। आज उनकी जयंती पर यह किस्सा न केवल प्रेरणा देता है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस अध्याय को भी उजागर करता है, जिसमें साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि थे।

