
फीचर डेस्क : वैदिक पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन शक्ति के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी कालरात्रि तंत्र साधना और भय से मुक्ति दिलाने वाली अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी विधिवत उपासना करने से साधक के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा, असुरी शक्तियां और अज्ञात भय समाप्त हो जाते हैं। नवरात्रि के सातवें दिन भक्त मां कालरात्रि की कृपा पाने के लिए व्रत एवं विशेष पूजन अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
मां कालरात्रि पूजा का शुभ मुहूर्त 2026
ब्रह्म मुहूर्त: प्रात: 04:59 बजे से प्रात: 05:47 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:43 बजे से अपराह्न 12:38 बजे तक
संध्या पूजा मुहूर्त: अपराह्न 03:54 बजे से सायंकाल 06:14 बजे तक
मां कालरात्रि की पूजन विधि
देवी कालरात्रि की पूजा में विशेष नियमों का पालन किया जाता है:
स्नान एवं संकल्प: प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
अभिषेक एवं श्रृंगार: मां कालरात्रि की प्रतिमा अथवा चित्र को गंडोदक या गंगाजल से अभिषेक कराएं और देवी को वस्त्र अर्पित करें।
पूजा सामग्री: माता को कुमकुम, रोली, लाल चंदन, अक्षत और गुड़हल के लाल पुष्प समर्पित करें।
दीप प्रज्ज्वलन: देवी के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक और धूप प्रज्ज्वलित करें।
मंत्र जाप व आरती: मां कालरात्रि के बीज मंत्रों का जाप करें, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और पूर्ण श्रद्धा के साथ देवी की आरती उतारें।
भोग एवं प्रसाद: पूजन के पश्चात देवी को विशेष भोग अर्पित करें और सभी उपस्थित भक्तों में प्रसाद वितरित करें।
मां कालरात्रि का प्रिय भोग
शास्त्रों के अनुसार मां कालरात्रि को गुड़ अति प्रिय है। सातवें दिन की पूजा में माता को गुड़ या गुड़ से निर्मित पारंपरिक मिष्ठान का भोग लगाना उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस विशेष भोग से देवी अति प्रसन्न होकर आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
मां कालरात्रि की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज नामक दैत्यों ने तीनों लोकों में भारी उत्पात मचा रखा था। सभी देवता इस संकट से त्राण पाने के लिए भगवान शिव की शरण में गए। तत्पश्चात महादेव के निर्देश पर माता पार्वती ने दुर्गा रूप धारण किया।
युद्ध के मैदान में जब मां दुर्गा ने रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उसे प्राप्त वरदान के कारण उसके रक्त की हर एक बूंद भूमि पर गिरते ही नए रक्तबीज का निर्माण कर देती थी। इस विकट स्थिति को समाप्त करने के लिए मां दुर्गा ने अपने तेज से मां कालरात्रि को प्रकट किया। देवी कालरात्रि ने रक्तबीज का वध करते समय उसके शरीर से निकलने वाले संपूर्ण रक्त को भूमि पर गिरने से पूर्व अपने मुख में भर लिया। इस प्रकार मां कालरात्रि ने रक्तबीज का पूर्ण संहार कर देवताओं को निर्भय किया।

