एक सोन चिरइया बन कर वो
हर पल इतराया करती थी
कभी इस डाली से उस डाली
हर घर आंगन वो रहती थी

कैसी देहरी कैसा चौखट
बेफिक्र था उसका अल्हड़पन
वो नन्ही सी निश्छल मन की
थी अबोध बड़ी उसकी चितवन
जब भी दिखती मन हर लेती
उसे मैं बाहों में भर लेती
एक दिठौना माथे पर
चुपके से उसके कर देती
वो सोन चिरइया कहां गई
बरबस एक हूक सी उठती है
अब हर मुंडेर और आंगन में
बड़ी गहरी उदासी दिखती है
अखबार के उजले पन्नों पर
एक स्याह कहानी चस्पा है
शैतान के आदम पंजों ने
उसके पंखों को नोचा है
हाय ये कैसी दुनिया है
जहां बचपन भी महफूज नहीं
और कौन बतायेगा सबको
कि कौन गलत है , कौन सही
इससे तो अच्छा वो युग था
भगवान अलग शैतान अलग
कैसे अब कोई जानेगा
मुखड़े के भीतर कौन है अब।
डाॅ. क्षमा त्रिपाठी

