Jamshedpur : पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा जंगल में नक्सल गतिविधियों को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से सक्रिय रेड कॉरिडोर में अब आत्मसमर्पण को लेकर हलचल तेज हो गई है। सुरक्षाबलों की लगातार घेराबंदी, अभियान और संगठन के भीतर बढ़ते दबाव के कारण नक्सली कैडरों में खलबली मची हुई है। खबर है कि संगठन का बड़ा चेहरा और एक करोड़ का इनामी मिसिर बेसरा भी सरेंडर पर विचार कर रहा है।
सुरक्षाबलों के बढ़ते दबाव से कमजोर पड़ता संगठन
पिछले दो वर्षों से सुरक्षा एजेंसियां सारंडा में लगातार ऑपरेशन चला रही हैं। हाल के महीनों में कई मुठभेड़ों और बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बाद नक्सलियों की गतिविधियां लगभग थम गई हैं। तीन महीने से जंगल में उनकी आवाजाही भी कम हो गई है। लगातार दबाव के कारण नक्सली अब रनिंग कैंप के जरिए ठिकाना बदलने को मजबूर हैं।
आईईडी के सहारे बचाव, लेकिन अब रास्ते बंद
सारंडा में पहले से लगाए गए 400 से अधिक आईईडी बम नक्सलियों की सुरक्षा ढाल बने हुए थे, लेकिन सुरक्षाबल तेजी से इन्हें निष्क्रिय कर रहे हैं। इससे नक्सलियों की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो गई है। अनुमान है कि अब महज 45-50 नक्सली ही इस इलाके में बचे हैं, जो लगातार खतरे में हैं।
संगठन के भीतर मतभेद तेज
सूत्रों के अनुसार, नक्सली अब दो गुटों में बंटते नजर आ रहे हैं। एक गुट हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटना चाहता है, जबकि दूसरा गुट अब भी गुरिल्ला युद्ध जारी रखने के पक्ष में है। झारखंड के स्थानीय नक्सली सरेंडर के पक्ष में हैं, जबकि बाहर के राज्यों से जुड़े कमांडर संघर्ष जारी रखने की बात कर रहे हैं। इस मुद्दे पर आपसी तनाव भी सामने आया है।

मिसिर बेसरा पर बढ़ा दबाव
एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा पर आत्मसमर्पण का दबाव बढ़ता जा रहा है। बताया जा रहा है कि उसने खुद को संगठन से अलग-थलग कर लिया है। उसके परिवार, खासकर बेटे की भावनात्मक अपील और उसके गुरु किशन दा की आखिरी चिट्ठी ने उस पर गहरा असर डाला है।
किशन दा की चिट्ठी बनी टर्निंग पॉइंट
नक्सली नेता किशन दा उर्फ प्रशांत बोस ने अपनी मौत से पहले एक पत्र में सशस्त्र संघर्ष को मौजूदा परिस्थितियों में मुश्किल बताया था। उन्होंने संगठन को हालात का पुनर्मूल्यांकन करने और आत्मसमर्पण जैसे विकल्पों पर विचार करने का संकेत दिया था। यह पत्र अब नक्सलियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
सरेंडर पर इनाम और सुरक्षित भविष्य का लालच
जानकारों का मानना है कि यदि मिसिर बेसरा आत्मसमर्पण करता है, तो उसे घोषित एक करोड़ रुपये का इनाम मिल सकता है। यह राशि उसके और उसके परिवार के लिए सुरक्षित जीवन का रास्ता खोल सकती है। वहीं जंगल में रहना अब लगातार खतरे से भरा है।
पुलिस और परिवार के जरिए संपर्क
पुलिस मुख्यालय के अनुसार कई नक्सली सरेंडर के लिए संपर्क में हैं। सुरक्षाबल नक्सलियों के परिवारों के माध्यम से भी उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित कर रहे हैं। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने मिसिर बेसरा के संगठन छोड़ने की पुष्टि नहीं की है।
झारखंड में नक्सल प्रभाव लगभग खत्म
पुलिस के अनुसार राज्य का करीब 95 प्रतिशत हिस्सा नक्सल मुक्त हो चुका है। बचे हुए नक्सली लगातार ठिकाना बदल रहे हैं और दबाव में हैं। फिलहाल सारंडा में कुछ बड़े इनामी नक्सलियों समेत सीमित संख्या में कैडर ही सक्रिय बताए जा रहे हैं।
बाहरी कमांडरों का दबदबा
झारखंड में सक्रिय नक्सली संगठन में अब भी बाहरी राज्यों के कमांडरों का प्रभाव अधिक है। बिहार, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के नक्सली यहां नेतृत्व कर रहे हैं, जिससे स्थानीय कैडरों में असंतोष भी बढ़ रहा है।
कुल मिलाकर सारंडा में नक्सल आंदोलन अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है। सुरक्षाबलों की सख्ती, संगठन के भीतर टूट और सरेंडर की बढ़ती इच्छा इस बात के संकेत हैं कि आने वाले समय में यहां बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
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