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Jitiya Vrat 2024 : 24 या 25 सितंबर, किस दिन रखा जाएगा जिउतिया व्रत, जानें शुभ मुहूर्त

by Rakesh Pandey
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फीचर डेस्क : जितिया (जिउतिया या जीवित्पुत्रिका) एक व्रत है, जिसे निर्जला (बिना जल ग्रहण किए) उपवास रह कर पूरे दिन किया जाता है। इस कठिन व्रत में माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, निरोगी काया व सुख-समृद्धि की मंगलकामना करती हैं। विक्रम संवत के आश्विन माह में कृष्ण-पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक यह तीन-दिवसीय त्योहार मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित उन प्रदेशों और विदेश में मनाया जाता है, जहां बिहार-यूपी के लोग प्रवास करते हैं।

जितिया व्रत का हिंदू धर्म में खास महात्म्य है। यह व्रत बहुत ही कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। महिलाएं बिना अन्‍न-जल ग्रहण किए इस व्रत को करती हैं और अपनी संतान के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य और सफलता की कामना करती हैं। इस साल यह व्रत 25 सितंबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत करके भगवान जीमूतवाहन की विधिपूर्वक पूजा करती हैं। आइए आपको बताते हैं जितिया व्रत का महत्‍व, पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत करने के लाभ। व्रत का पारण 26 सितंबर को सूर्योदय के बाद होगा, जबकि 24 सितंबर को व्रत का नहाय-खाय होगा।

जितिया व्रत का शुभ मुहूर्त

चौघड़िया शुभ मुहूर्त : शाम 4 बजकर 43 मिनट से शाम 6 बजकर 13 मिनट तक रहेगा।
ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 4.35 बजे से सुबह 5.22 बजे तक।
प्रातः संध्या : सुबह 4.59 बजे से सुबह 6.10 बजे तक,
विजय मुहूर्त : दोपहर 2.12 बजे से दोपहर 3 बजे तक,
गोधूलि मुहूर्त : शाम 6.13 बजे से शाम 6:37 बजे तक,
सायाह्न संध्या : शाम 6.13 बजे से शाम 7.25 बजे तक

जितिया व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार, एक गरुड़ और एक मादा लोमड़ी नर्मदा नदी के पास एक हिमालय के जंगल में रहते थे। दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा करते और उपवास करते देखा और खुद भी इसे देखने-करने की कामना की। उनके उपवास के दौरान, लोमड़ी भूख के कारण बेहोश हो गई और चुपके से भोजन किया। दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया। परिणामस्वरूप, लोमड़ी से पैदा हुए सभी बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही खत्म हो गए और चील की संतान लंबी आयु के साथ फलने-फूलने लगे।

जितिया व्रत का महत्‍व

हिंदू धर्म में मान्‍यता है कि इस व्रत को करने से आपकी संतान के ऊपर से हर प्रकार का संकट टल जाता है। इस व्रत को महिलाओं को हर साल करना होता है और इसे तब तक नहीं छोड़ा जाता है, जब तक शारीरिक या मानसिक रूप से स्वस्थ हों।

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