Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर से सटे छोटे से गांव छोटा बांकी से निकली 21 साल की बालिका बिरहोर आज एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं। सीमित संसाधनों और कठिन हालात के बावजूद उन्होंने यह साबित कर दिया कि सही मार्गदर्शन और मजबूत इरादों के बलबूते किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है।
बालिका, सुखरानी और सुभोध बिरहोर की बेटी हैं और सबसे खास बात यह कि वह झारखंड की कमजोर माने जाने वाले जनजातीय समूह (पीवीटीजी) बिरहोर समुदाय से आती हैं। उनके परिवार की आजीविका जंगल के कामों और चावल से बनी हड़िया बेचने पर निर्भर है। इससे परिवार को लगभग 500 रुपये प्रतिमाह की आमदनी होती है। ऐसे माहौल में बालिका के सामने बेहद कम मौके थे। चुनौतियां अधिक थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा गांव के हिंदी मीडियम स्कूल से शुरू हुई। इसके खुशकिस्मती से वह टाटा स्टील फाउंडेशन के संपर्क में आईं। टाटा स्टील फाउंडेशन ने उनका दाखिला चक्रधरपुर के कार्मेल स्कूल में करा दिया। यहां से बालिका ने 2020 में 82 प्रतिशत अंकों के साथ मैट्रिक पास किया। इसके बाद उन्होंने लुपुंगुटू स्थित सेंट जेवियर्स इंटर कॉलेज से 63 प्रतिशत के साथ इंटरमीडिएट (विज्ञान) पूरा किया।
इंटरमीडिएट के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आगे की पढ़ाई को लेकर थी। परिवार की झिझक और बड़े शहर जाने की अनिश्चितता ने उनके कदम रोकने की कोशिश की। इसी दौरान टाटा स्टील फाउंडेशन के प्रोजेक्ट आकांक्षा की टीम ने उनके और उनके परिवार से लगातार संवाद किया। इस पहल के तहत उन्हें साइकोमेट्रिक टेस्ट, करियर काउंसलिंग और मार्गदर्शन मिला, जिससे उनके परिवार का भरोसा बढ़ा और उन्होंने आगे बढ़ने का फैसला लिया।
तीन लाख रुपये होगा सालाना पैकेज
इसके बाद प्रोजेक्ट समृद्धि के तहत उन्हें कोचिंग और मेंटरशिप मिली। उन्होंने प्रवेश परीक्षा पास कर बेंगलुरु के नारायण हृदयालय कॉलेज ऑफ नर्सिंग में जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (जीएनएम) कोर्स में दाखिला लिया। यह उनके जीवन का बड़ा बदलाव था, क्योंकि वह पहली बार अपने गांव से इतनी दूर गई थीं। फाउंडेशन ने उनकी पहली हवाई यात्रा भी सुनिश्चित की और पूरे प्रशिक्षण के दौरान उनका मार्गदर्शन किया।
अब बालिका ने अपना नर्सिंग प्रशिक्षण पूरा कर लिया है और बेंगलुरु के नारायण हृदयालय अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में नौकरी हासिल की है। वह अप्रैल 2026 से जॉइन करेंगी, जहां उनका वार्षिक पैकेज 3 लाख रुपये होगा। वह इमरजेंसी यूनिट में काम कर अनुभव हासिल करना चाहती हैं। बालिका कहती हैं कि अगर उन्हें टाटा स्टील फाउंडेशन का सहयोग नहीं मिला होता, तो शायद उनकी जल्दी शादी हो जाती और वह घर तक सीमित रह जातीं। आज उनकी सफलता उनके समुदाय के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है।
अब भी गांव से जुड़ी है बालिका
शहर में रहते हुए भी बालिका अपने गांव से जुड़ी हुई हैं। वह वहां की महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता, पोषण और आधुनिक चिकित्सा के महत्व के बारे में जागरूक करती हैं। साथ ही, भविष्य में अपने गांव में पानी की समस्या को दूर करने के लिए हैंडपंप लगाने का सपना भी देख रही हैं। बालिका की कहानी यह बताती है कि सही अवसर, मार्गदर्शन और समर्थन मिलने पर दूर-दराज के इलाकों के युवा भी अपने सपनों को साकार कर सकते हैं और समाज में बदलाव ला सकते हैं।
Read also Jamshedpur News: मानगो में विश्वनाथ ज्वेलर्स से 23 लाख रुपए के गहनों से भरा डिब्बा लेकर युवक चंपत

