चाईबासा : झारखंड स्थापना के बाद से लाल आतंक का गढ़ बना एशिया प्रसिद्ध सारंडा जंगल 26 साल बाद नक्सल मुक्त होने की ओर बढ़ रहा है। केंद्रीय गृहमंत्री के आदेश पर चल रहे नक्सल मुक्त अभियान का असर सारंडा में साफ दिखने लगा है। सुरक्षाबलों के लगातार दबाव, बड़े ऑपरेशन और ताबड़तोड़ मुठभेड़ों के बाद एक करोड़ के इनामी कुख्यात नक्सली मिसिर बेसरा अकेला पड़ गया है। उसके दस्ते में भगदड़ मच गई है।सूत्रों के अनुसार सारंडा में चारों तरफ सुरक्षाबलों की घेराबंदी और लगातार मुठभेड़ में मारे जा रहे नक्सलियों से संगठन में हड़कंप है।
कभी दहशत फैलाने वाले इनामी नक्सलियों में अब मौत का खौफ समा गया है। जंगल में बढ़ते दबाव और सुरक्षाबलों की सख्ती से घबराकर मिसिर बेसरा के दस्ते से जुड़े 20 से 25 सक्रिय नक्सली अगले एक-दो दिनों में आत्मसमर्पण कर सकते हैं।झारखंड पुलिस मुख्यालय रांची स्तर पर इनके औपचारिक आत्मसमर्पण की तैयारी शुरू हो चुकी है।
सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि लगातार बढ़ते दबाव के कारण मिसिर बेसरा भी सारंडा छोड़ चुका है। टूटते नेटवर्क और कमजोर होती पकड़ के बीच एजेंसियों को उम्मीद है कि वह भी जल्द मुख्यधारा में लौट सकता है।पिछले कई महीनों से झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर की संयुक्त टीमों ने सारंडा में लगातार सर्च ऑपरेशन, घेराबंदी और एंटी नक्सल अभियान चलाया है। रणनीतिक कार्रवाई से नक्सली संगठन की कमर टूट गई है।
एक समय नक्सलियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाने वाला सारंडा अब उनके लिए सबसे बड़ा संकट क्षेत्र बन चुका है। संगठन के भीतर बिखराव शुरू हो गया है और बड़ी संख्या में नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता तलाश रहे हैं।सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में आए 20 से 25 सक्रिय नक्सली शामिल हैं।
ये सभी जल्द आत्मसमर्पण कर इसमें 8 से 10 महिला नक्सली भी शामिल हैं। इधर सुरक्षा बलों का कहना है कि सरकार की आत्मसमर्पण नीति, पुनर्वास पैकेज और लगातार बढ़ते ऑपरेशन से नक्सलियों का मनोबल टूटा है। सारंडा में शांति बहाली के लिए यह निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। ग्रामीणों में भी उम्मीद जगी है कि अब जंगल में विकास की रोशनी पहुंचेगी।

