रांची : झारखंड में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के होने वाले परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। रांची प्रेस क्लब में आयोजित एक विशेष सेमिनार में पूर्व मंत्री और राज्य सरकार की समन्वय समिति के सदस्य बंधु तिर्की ने दो टूक कहा कि राज्य में परिसीमन का आदिवासी समाज पर कोई भी बुरा असर नहीं पड़ने दिया जाएगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परिसीमन के बहाने अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित सीटों को कम करने की कोशिश हुई, तो इसका लोकतांत्रिक तरीके से कड़ा विरोध किया जाएगा।
परिचर्चा में झारखंड के कोने-कोने से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, वकीलों और आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। वक्ताओं ने साफ किया कि परिसीमन सिर्फ चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का खेल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आदिवासियों के राजनीतिक अधिकारों और पांचवीं अनुसूची की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
आरक्षित सीटों में कोई कटौती नहीं करने की मांग
यदि सिर्फ जनसंख्या को पैमाना बनाया गया, तो विस्थापन और पलायन झेल रहे आदिवासी समाज की राजनीतिक भागीदारी कम हो जाएगी, जो कि उनके संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।
इस दौरान साल 2002 के परिसीमन आयोग के प्रस्ताव का हवाला दिया गया, जिसमें झारखंड में एसटी विधानसभा सीटों को 28 से घटाकर 22 और लोकसभा सीटों को 5 से घटाकर 4 करने की सिफारिश की गई थी। तब भारी जनआंदोलन के बाद केंद्र सरकार को दखल देना पड़ा था।
सेमिनार में मुख्य रूप से मांग की गई कि आरक्षित सीटों में कोई कटौती न हो और सीटें बढ़ने पर आदिवासियों का कोटा भी उसी अनुपात में बढ़ाया जाए।
अपनी मांगों को लेकर आदिवासी समाज आगामी 2 अगस्त को रांची में एक ‘आदिवासी एकता महाजुटान रैली’ करेगा। इसके अलावा, रणनीति तैयार करने के लिए विशेष कमेटियों का गठन किया गया है और 17 जून को रांची में सभी राजनीतिक दलों के साथ एक अहम बैठक भी बुलाई गई है।
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