मौजूदा राजनीतिक माहौल में हमारे गांव की एक कहावत आज देश के बड़े ‘इकोनॉमिस्ट’ पर अक्षरशः सही साबित हुई है. जून की चमचमाती और खौलती दुपहरी के बीच राजधानी रांची की सड़कों पर अजीब-ओ-गरीब नजारा देखने को मिला. हुआ यूं कि नये नवेले भाजपाई बने एक्सएलआरआई वाले प्रोफेसर डॉ. गौरव वल्लभ को अचानक दिव्य ज्ञान हुआ कि झारखंड में राज्यसभा का ‘भंडारा’ चालू है. जमशेदपुर और उदयपुर की शिकस्त के बाद दिल्ली के एयर कंडीशनर कमरे में बैठकर उनके मन में हसरत जागी कि चलो रांची चलते हैं, वहां गरमा-गरम ‘पूरी’ (राज्यसभा की सीट) छन रही है. सो, अपनी ‘सलाहकार चौकड़ी’ के बहकावे में आकर गौरव बाबू कुर्ता-पायजाम चमकाए, अपनी पूर्व वैचारिक निष्ठा को खूंटी पर टांग, हाथ में बड़ा सा लोटा (नामांकन पत्र) लिए मंदिर के भीतर घुस गए.
लेकिन अफ़सोस! अंदर पहुंचे तो पता चला कि भंडारा तो कब का खत्म हो चुका है, कढ़ाई मँज चुकी है और हलवाई पत्तल समेट रहे हैं.ऐसे में पूरी मिलना तो दूर की बात थी, जब मायूस चेहरा लटकाए गौरव बाबू मंदिर के बाहर आए, तो हालात देखकर पैरों तले जमीन खिसक गई. पूरी के चक्कर में उनकी चप्पल भी कोई मार ले गया था! अब जून की इस जानलेवा धूप में, बिना चप्पल के जैसे ही राजनीति के इस स्वघोषित ‘द्रोणाचार्य’ ने झारखंड की तपती लाल मिट्टी पर पैर रखा, पैरों में ऐसे फफोले पड़े कि अब वह न तो दौड़ने लायक बचे, और न चलने लायक. गांव के लोग अक्सर बोलचाल में कहते हैं,”आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”. साहब के साथ भी यही हुआ. सोशल मीडिया वाली शब्दावली में कहें तो झारखंड में साहब संग मोये-मोये हो गया.
दरअसल, झारखंड की जनता के बीच एक सीधा सा अलिखित नियम है. यह प्रदेश जितना भोला है, उतना ही खुद्दार है. अगर आप यहां मेहमान बनकर आएंगे, तो यह आपको सिर-आंखों पर बिठाएगा. बाहरी-भीतरी नहीं देखता. जिसे अपनाता है, उसे भरपूर सम्मान देता है. लेकिन जब इसे लग जाए कि सामने वाला खुद को चाणक्य समझ रहा है और झारखंडियों को शतरंज का प्यादा, तब यही झारखंड बड़े-बड़े सूरमाओं को गौरव वल्लभ की तरह नंगे पैर पैदल करना भी करना जानता है.
‘जीरो’ गिनते-गिनते खुद राजनीति का ‘बिग जीरो’ बन गए!
याद कीजिए 10 सितंबर 2019 का वह दिन! रांची की इसी माटी ने गौरव वल्लभ को ‘ब्रांड’ बनाया था. टीवी स्क्रीन पर संबित पात्रा के सामने छाती ठोककर, उंगली नचाकर पूछ रहे थे, “5 ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं, बताओ पात्रा जी, बताओ!” पात्रा जी तो खैर जो हुए सो हुए, लेकिन गौरव बाबू का ग्राफ ऐसे ऊपर भागा जैसे शादी-ब्याह में हाइड्रोजन वाला गैस का लाल गुब्बारा भागता है. लेकिन गुब्बारे की शाश्वत नियति क्या होती है? एक न एक दिन फुस्स होना.
गौरव बाबू को मुगालता हो गया कि उन्होंने गणित का ‘जीरो’ क्या ढूंढ लिया, वह राजनीति के ‘आर्यभट्ट’ बन गए. मगर राजनीति की बिसात और टीवी डिबेट की टीआरपी में उतना ही फर्क है जितना असली पूरी और इंस्टाग्राम पर रील्स वाली पूरी में होता है.
जानें दो चुनावों में कैसा रहा ट्रैक रिकॉर्ड
• जमशेदपुर का ‘उड़न छू कांड’
2019 में जमशेदपुर पूर्वी से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े. जनता ने इन्हें महज 18,976 वोट देकर इनकी सियासी जमीनी हकीकत का पहला ‘ट्रेलर’ दिखाया. अभी वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी कि साहब रांची से सीधे दिल्ली की फ्लाइट पकड़कर ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग.
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* ससुराल में भी ‘फ्लॉप शो’
तीन साल बाद दिमाग में फिर चुनावी कीड़ा कुलबुलाया. कागजों पर ‘ससुराली इक्वेशन’ बैठाया और सीधे पहुंच गए उदयपुर. सोचा, दामाद जी पधारे हैं तो जनता पलक-पावड़े बिछा देगी. कांग्रेस ने भी अपने पुराने, समर्पित कार्यकर्ताओं की छाती पर मूंग दलकर इन्हें टिकट दे दिया. नतीजा? दामाद जी को 32,771 वोटों से ऐसी पटखनी मिली कि इनके सारे आर्थिक सिद्धांत धरे के धरे रह गए.
जमशेदपुर में हारे तो जमशेदपुर छोड़ा, उदयपुर में हारे तो जिस कांग्रेस ने इन्हें पहचान दी, उसी को लात मार दी! इसे कहते हैं ‘अवसरवादिता की पराकाष्ठा’.
…जब ‘रजनीकांत’ बनकर आए नथवानी और ‘बुलेट’ मुड़ गई!
2023 की हार के बाद तीन साल पूरे होने को आए थे, तो गौरव बाबू को फिर से ‘चुनावी खुजली’ होने लगी. इस बार वह कांग्रेस का ‘हाथ’ छोड़कर बीजेपी का ‘कमल’ थाम चुके थे और खुद को सबसे बड़ा मोदी भक्त साबित करने की होड़ में थे. उन्होंने सोचा कि इस बार तो सीधे ‘सांसद’ (लुटियंस दिल्ली के माननीय) बनकर ही दम लेंगे. न पार्टी ने कोई आधिकारिक घोषणा की, न झारखंड प्रदेश बीजेपी कमेटी को कोई भनक थी, बस प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य होने का रौब झाड़ते हुए रांची पहुंच गए और मीडिया मैनेज करके खुद की हवा बनवाना शुरू कर दिया.
इन्हें लगा कि झारखंडी भाजपा विधायकों को अपनी लच्छेदार अंग्रेजी और ‘ट्रिलियन’ वाले पुराने ज्ञान से सम्मोहित कर लेंगे. खुद ही पर्चा खरीद लाए और खुद ही अपनी पीठ थपथपाने लगे. लेकिन तभी कहानी में एंट्री होती है असली और हैवीवेट खिलाड़ी परिमल नथवानी की!
नथवानी की एंट्री ठीक वैसे ही हुई जैसे दक्षिण की फिल्मों में रजनीकांत की होती है, जो सामने से आ रही बुलेट में अपनी तरफ से ऐसी गोली मारता है कि बुलेट दो टुकड़ों में बंटकर वापस चलाने वाले की छाती में ही धंस जाती है!
नथवानी के आते ही बीजेपी और पूरे एनडीए ने उन्हें एक सुर में समर्थन दे दिया और हमारे गौरव बाबू हाथ में कोरा नामांकन पत्र पकड़े मुंह बाए ताकते रह गए. रही-सही कसर बाबूलाल मरांडी ने यह कहकर पूरी कर दी कि “भाई, हमारे पास संख्याबल नहीं था, इसलिए हमने नथवानी जी को समर्थन दिया.” इस एक कूटनीतिक झटके ने गौरव बाबू को 7 साल पुराना वही ‘ट्रिलियन का जीरो’ याद दिला दिया कि गौरव बाबू… किताब वाला जीरो भले ही मैथ में काम आता हो, लेकिन राजनीति में जब ‘जीरो’ मिलता है तो इंसान कहीं का नहीं रहता.
चापलूसी के चक्कर में साख भी गई और स्वाभिमान भी
झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने भी इस मौके पर बहती गंगा में हाथ धोते हुए गौरव बाबू का सरेआम ‘पोपट’ कर दिया. जेएमएम ने सोशल मीडिया पर तंज कसा: “भाजपा इनसे ज़ीरो गिनवाती रही और बड़े सूटकेस वाले गुजराती को राज्यसभा सीट बेच दिया।
गौरव बाबू की सबसे बड़ी मूर्खता यह रही कि वह यह समझ ही नहीं पाए कि यह कांग्रेस नहीं है जहां ‘लाउडस्पीकर’ बनकर मलाई काटी जा सकती है, यह काडर बेस बीजेपी है. यहां सिर्फ मीडिया में हवा बनाकर और चापलूसी के कीर्तिमान स्थापित करके टिकट नहीं मिलते. मोदी-अमित शाह का ध्यान खींचने के चक्कर में उन्होंने टीवी डिबेट्स में जिस तरह का बौद्धिक खोखलापन और ओछापन दिखाया, गलियों के नुक्कड़ जैसी भाषा में पूर्व सहयोगियों पर ‘बिलो द बेल्ट’ वार किए, उसने उनके बचे-खुचे ब्रांड की भी लंका लगा दी.
आरपीएन सिंह भी कांग्रेस से बीजेपी में गए, झारखंड के प्रभारी रहे, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक गरिमा और शालीनता बनाए रखी. मगर गौरव बाबू तो सत्ता के लालच में प्यार की भाषा ही भूल गए. उनकी हर बाइट से जो अहंकार और ‘एरोगेंसी’ झलकती है, उसने देश के उन युवाओं को सबसे बड़ा झटका दिया जो कभी उन्हें अपना रोल मॉडल मानते थे. आज उनकी राजनीतिक हैसियत का एक्स-रे यह है कि वे दोनों तरफ से अछूत हैं. अब न कांग्रेस उन्हें गंभीरता से लेती है, न बीजेपी के शीर्ष नेता. राहुल गांधी और खड़गे को कोसते-कोसते वह खुद सोशल मीडिया पर मीम्स और ट्रोलिंग का सबसे बड़ा मटीरियल बन चुके हैं.
अगर सरल शब्दों में कहें तो जिस रांची ने कभी गौरव वल्लभ को अर्श पर बिठाकर ‘हीरो’ का तमगा दिया था, उसी रांची ने आज उनकी अवसरवादी और महत्वाकांक्षी राजनीति का ऐसा पोस्टमार्टम किया है कि वे पूरी तरह ‘फर्श’ पर आ गए हैं. भंडारे की लालच में चप्पल गंवाने और पैरों में छाले डलवाने के बाद, अब नंगे पैर दिल्ली का टिकट कटवाइए और एकांत में बैठकर गिनते रहिए कि एक ट्रिलियन में कितने जीरो होते हैं!
लेखक : मलंग

