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Jharkhand Bureaucracy Satire : नौकरशाही : सटलऽ त गईलऽ

Jharkhand Bureaucracy : वनांचल के नौकरशाही वाले मुहल्ले में इन दिनों एक नया मुहावरा खूब चल पड़ा है ‘’।सटलऽ त गईलऽ अचानक इस मुहावरे का चर्चा में आना महज संयोग नहीं, बल्कि मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी सच्चाई है। वजह यह है कि बीते कुछ वर्षों में सत्ता के सबसे करीब बैठने वाले कई बड़े चेहरे इन दिनों जांच व पूछताछ के दौर से गुजर रहे हैं, अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे में अब कुर्सी की ऊंचाई से ज्यादा उसके टिकाऊ होने की चिंता है। आखिर क्या कुछ चल रहा है अंदरखाने? जानिए द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से…।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracyनांचल की राजधानी में एक अहाते के अंदर पुराने पीपल के नीचे गुरु की चौपाल सजी थी। गुरु बता रहे थे कि उन्होंने जितने मौसम नहीं देखे, उससे ज्यादा तबादले देखे हैं। सामने बैठे एक चेले ने पूछा, ‘गुरु, इन दिनों आपके मुहल्ले में हर कोई इतना डरा-सहमा सा क्यों है?’
गुरु ने मुस्कुराते हुए कुल्हड़ वाली चाय का आखिरी घूंट अंदर लिया। बोले, ‘सुनो, पहले लोग कहते थे कि सत्ता के जितने करीब रहोगे, उतना सुख मिलेगा। अब कहते हैं कि जितना करीब रहोगे, उतनी फाइलें खुलेंगी’। चेले ने फिर सवाल किया, ‘क्या सिस्टम इतना बदल गया है?’ गुरु बोले, ‘यह सिस्टम का बदलाव नहीं, समय का चक्र है।

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कभी जिनकी कलम से पूरे वनांचल का नक्शा बदल जाता था, आज वही जवाब देने के लिए अपने पुराने दस्तावेजों का हिसाब खोजते फिर रहे हैं। कोई एजेंसी की गलियों में भटक रहा है, कोई अदालत के चक्कर लगा रहा है। इन सबके बीच बहुत सारे लोग अपनी बरसों की बनाई प्रतिष्ठा बचाने में दिन-रात एक किए हुए हैं’। चेले की उत्सुकता देख गुरु ने आगे कहा, ‘नाम मत पूछो। लिस्ट बड़ी लंबी है। एक के बाद एक नंबर लग रहे हैं। किसका कब बुलावा आ जाए, कहा नहीं जा सकता। इसलिए किरदारों के नाम पर मत जाओ, भाव समझो। कुर्सी अलग-अलग है, लेकिन हर कहानी का कथानक कमोवेश एक जैसा है’। इतना सुनते ही गुरु की चौपाल में बैठे एक महाशय हंस पड़े। बोले, ‘गुरु, पहले तो लोग मलाई की चर्चा करते थे। इन दिनों मामले की करते हैं’।

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गुरु बोले, बिल्कुल सत्य वचन है बाबू, वनांचल में मलाई काट रहे लोगों के मन में डर बैठ गया है कि मलाई कब खटाई में बदल जाए, कह नहीं सकते। दूसरे इलाकों में सत्ता के गलियारों के किस्से अलग होंगे, लेकिन वनांचल में अब ‘साहेबान’ पहले फाइल का वजन देखते हैं, फिर कुर्सी का। चेला फिर बोला, ‘तो क्या अब बड़ी कुर्सी पर बैठने से हाकिम डरने लगे हैं?’ गुरु ने सिर हिलाया, ‘डर पद को लेकर नहीं है, पद के बाद आने वाले सवालों से है। कुर्सी पर बैठते समय जो तालियां सुनाई देती हैं, वही समय बदलने पर कानूनी दस्तक में परिवर्तित हो जाएं तो समझ लो कि किस्मत ने करवट ले ली है’।

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चौपाल विसर्जित होने वाली थी। जाते-जाते गुरु ने कहा- अक्सर सड़क से गुजरते समय ट्रकों के पीछे ज्ञान की बातें लिखी होती हैं। वनांचल की नौकरशाही पर इन दिनों एक मुहावरा बिल्कुल फिट बैठ रहा- ‘ सटलऽ त गईलऽ ’, जिन्हें यकीन न हो, आजमाकर देख लें। गुरु की बातों को सुनकर वनांचल की नौकरशाही के पन्ने एक के बाद एक मानस पटल पर आने लगे। मन ने कहा- गुरु! बात तो सही कह रहे। सभी के साथ खुद को जोड़ते हुए झुककर प्रणाम किया और चल दिया। रास्ते में कोई जानी-पहचानी गजल गुनगुना रहा था। मस्तिष्क को यह संदेश देता हुआ महसूस हुआ – ‘ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है…’।

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