
Jharkhand Bureaucracy : पुस्तक गुरु की इकलौती प्रेमिका है। फुर्सत के क्षणों में वह अक्सर उनका हाथ थाम बैठ जाते हैं। अवकाश समझकर घर पहुंच गया। देखा गुरु गोरख पांडेय पर टिके हैं। नजरों के सामने ‘समझदारों का गीत’ था। मौजूदा माहौल के लिहाज से गुरु का चयन मौजूं लगा। करीब आसन जमाने के कारण आंखें कविता की पंक्तियों पर पड़ गईं।
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लिखा था- ‘हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं, हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं, हम समझते हैं खून का मतलब, पैसे की कीमत हम समझते हैं, क्या है पक्ष में, विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं, हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं…’। नजदीक बैठे देखकर गुरु ने किताब किनारे रख दी। पूछा, और बताइए जनाब कैसे हैं हालात? जवाब दिया- गुरु आपकी भविष्यवाणी सही हो गई। गुरु समझ गए।
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मुस्कुराते हुए कहा- हम खूब जानते हैं कि आप क्या खंगालने आए हैं? दरअसल, एजेंसी अब खंगाल रही, गुरु ने फरवरी में ही सारा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया था। हवा अब बदली, लेकिन हालात का अंदाजा पहले ही हो गया था। गुरु बोले- रामचरितमानस में गोस्वामी जी लिख गए हैं- ‘बड़ अधिकार दच्छ जब पावा, अति अभिमानु हृदय तब आवा, नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं, प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं,..’। यही वजह थी कि प्रोटोकॉल का बुखार सिर चढ़कर नाच रहा था।
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हर काम जबरन कराने की हसरत जाग रही थी। एक झटके में सारा भ्रम टूट गया।कभी दूसरों को नोटिस दे रहे, समय चक्र बदला, खुद नप गए। गोस्वामी जी एक जगह और लिखते हैं ‘जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेही’। वनांचल वाले आयोग में हूबहू यही योग बना। एक बार फिर पुरानी कहानी दोहराई गई।
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आज गुरु की भाव-भंगिमाएं पूरी तरह साहित्यिक नजर आ रही थीं। कभी कविता बांचकर अफसरान का चरित्र चित्रण कर रहे थे, कभी इतिहास में दिए गए संकेत समझा रहे थे। मुख से निकल रहीं मानस की चौपाइयां भी हालिया घटनाक्रम पर सटीक बैठ रही थीं। सोचते-सोचते सवाल कर डाला, ‘आज बात क्या है गुरु! एक के बाद एक गोले दागे जा रहे हैं।’ गुरु बोले, अरे ऐसा कुछ नहीं। पुस्तकों-ग्रंथों में अंकित शब्द उसके रचयिता के लंबे अनुभव के निचोड़ होते हैं।
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वर्तमान के हालात से उनका साम्य होना कोई अचरज की बात नहीं है। रही मानस की बात तो मानस की चौपाइयां तो पूरा जीवन दर्शन हैं। इसमें सब कुछ है, जो दीन-दुनिया के हालात को देख मुंह से निकल पड़ता है। आज की प्रवचननुमा बातचीत ने काफी कुछ खोलकर रख दिया था। अब विदा लेने का समय था। सो, गुरु को प्रणाम कर निकल पड़ा।
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