Jharkhand Bureaucracy : गुरु अक्सर कहा करते थे कि सरकारी सेवा एक ऐसी नदी है, जिसमें उतरने वाला किनारे तो आ जाता है, लेकिन उसके पैरों में सरकारी पानी की नमी बहुत देर तक बनी रहती है। कई बार तो इस नमी का प्रभाव इतना अधिक होता है कि विभाग के लोग भी भूल जाते हैं कि साहब अब सेवा में हैं या स्मृतियों में। पिछले दिनों राजधानी के एक सरकारी दफ्तर में रोचक प्रसंग सुनने को मिला। आग की रोकथाम करने वाले महकमे में पदस्थापित एक अधिकारी के पास फोन घनघनाया। उधर से आदेशात्मक आत्मीयता से भरी आवाज आई…तीस फीट वाली सीढ़ी है? अचानक तीस फीट की सीढ़ी के लिए पूछताछ पर सिर खुजलाते हुए अधिकारी ने फाइलों और उपकरणों की दुनिया से जवाब दिया…नहीं सर, पैंतीस फीट वाली है। सीनियर सर की आवाज खनखनाई…अच्छा, वही ठीक है। अमुक साहब के घर पहुंचा दीजिए।
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अब आदेश मिला था तो पालन करना ही था। पूर्व हो चुके साहब की कोई घरेलू जरूरत रही होगी। पूर्व का अपना विभाग है ही तो बाजार क्यों जाते? अधिकारी ने मन ही मन गणित लगाया। पैंतीस फीट की सीढ़ी कोई साइकिल के कैरियर पर बांधकर ले जाने वाली वस्तु तो है नहीं। वाहन लगेगा, कर्मचारी लगेंगे, समय लगेगा। फिर भी सरकारी संस्कार जागे और जवाब आया, ‘ठीक है सर, हो जाएगा।’ कुछ देर में विभागीय वाहन तैयार हुआ। चार-पांच कर्मी जुटे। सीढ़ी लादी गई।
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वाहन रवाना हुआ। ऐसा लग रहा था मानो किसी इमारत में आग लगी हो और राहत अभियान शुरू हो गया हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां आग नहीं, सरकारी प्रभाव की चिंगारी धधक रही थी। गुरु ने प्रसंग बताया। फिर मुस्कुराते हुए व्याख्या की, ‘एक बात ठीक से समझ लीजिए, नौकरशाही में सीढ़ी दो तरह की होती है। एक वह, जिससे आदमी नौकरी के दौरान ऊपर चढ़ता है और दूसरी वह, जो नौकरी के बाद भी उसके घर तक पहुंच जाती है।’ उनकी बात में गजब का दर्शन छिपा था।
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सामान्य नागरिक को अगर घर की छत पर चढ़ना हो तो वह बाजार से सीढ़ी किराए पर खोजता है। पड़ोसी से मांगता है। मित्रों को फोन करता है। लेकिन, नौकरशाही के कुछ पुराने सूरमा ऐसे हैं, जो घरेलू जरूरतों को पूरी करने के लिए विभाग की ओर ही ताकते हैं। पुरानी आदत जो ठहरी। सवाल यह नहीं है कि सीढ़ी किस काम के लिए गई थी। सवाल यह है कि क्या सरकारी संसाधनों का रिश्ता पद से होता है या व्यक्ति से? अगर पद से होता है तो सेवानिवृत्ति के बाद वह रिश्ता समाप्त हो जाना चाहिए।
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यदि व्यक्ति से होता है, तो फिर सरकार को नियुक्ति पत्र में ही लिख देना चाहिए कि यह सुविधा आजीवन मिलती रहेगी। गुरु कहते हैं कि वनांचल की नौकरशाही में कुछ रिश्ते इतने मजबूत होते हैं कि फाइलें बदल जाती हैं, सरकारें बदल जाती हैं, नामपट्टिकाएं बदल जाती हैं, लेकिन कुछ फोन कॉलों का प्रभाव नहीं बदलता। उधर घंटी बजती है और इधर व्यवस्था सलामी देने को तैयार खड़ी रहती है। वैसे इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा सम्मान उस सीढ़ी का होना चाहिए। उसने अपने जीवन में न जाने कितनी बार आग बुझाई होगी? कितने लोगों को बचाया होगा? लेकिन शायद पहली बार उसे यह अहसास हुआ होगा कि नौकरशाही में उसकी उपयोगिता आग से ज्यादा प्रभाव की ऊंचाई नापने में है।
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