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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : मन रंजन भंजन

Jharkhand Bureaucracy : वनांचल के नौकरशाही वाले मोहल्ले में जबरदस्त हलचल मची है। बदलाव की तेज बयार ने सब कुछ उलट-पुलट दिया है। करीब दो दर्जन से अधिक हुक्मरान इधर से उधर हो गए हैं। अब इन बदलावों के पीछे के किस्से-कहानियों का दौर चल रहा है। कुछ लोग खुश हैं, कई चेहरों पर मायूसी है। इन सबके बीच असल खेल लोहे वाले नगर में हुआ। आखिर क्या कुछ चल रहा अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracy : पूजा घर से रामचरितमानस की पंक्तियां सुनाई दे रही थीं। नजदीक जाने पर पता चला कि गुरु पाठ कर रहे हैं। पहली चौपाई आई- ‘बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें’। फिर व्याख्या आई- ‘गोस्वामी जी लिखते हैं- शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना किए बिना करोड़ों योग और जप करने पर भी वांछित फल नहीं मिलता’।

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रात को निकले शासनादेश पर सुबह-सुबह विमर्श की अभिलाषा लिए गुरु से मिलने पहुंचा था। कुछ झोलटन टाइप नौकरशाह पहले से जमे थे। लिहाजा मौन धारण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। घंटे भर इंतजार के बाद पाठ समाप्त हुआ। नजर पड़ते ही गुरु ने टोका- अरे वहां क्यों खड़े हो, ‘आओ-आओ, यहां बैठो, सब अपने लोग हैं। उम्मीद थी, तुम्हारे दर्शन होंगे, लेकिन इतनी सुबह? सब सकुशल? गुरु ने सवाल किया, लिहाजा उत्तर देना था। सो, मुस्कुराते हुए कहा- हां गुरु, बस चला आया।

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सोचा बता दूं, आपकी एक भविष्यवाणी गलत हो गई। गुरु चौंक गए। बोले, मेरी गणना गलत! ऐसा कैसे? बताओ, क्या हुआ? जवाब दिया- लोहे की नगरी में सिटी ब्वॉय वाला शिगूफा! वाक्य पूरा होते ही गुरु हंस पड़े, बोले अरे यार कहां बात पकड़ कर बैठे हो? पांच अक्षर वाले नाम में दो पर टिके हो। तीन पर फोकस करो। सारी कृपा वहीं फंसी है।

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गुरु की यह बात सिर के ऊपर से निकल गई। अब इतना साफ हो गया कि ज्ञान का पिटारा खुलने वाला है। गुरु पूरे रौ में आ चुके थे। सो, मुख्य विषय पर लौटते हुए बोले, नौकरशाही के बाजार में ‘रंजन’ का बड़ा क्रेज है। बिल्कुल वैसे, जैसे कभी वनस्पति घी का मतलब डालडा। खैर कहानी सुनो। कथानक यह है कि सूची वाले रंजन करीब दस माह पहले धनुष भंजन करने वाले थे। ऐन वक्त पर सूर्य पुत्र का पेंच फंस गया। इच्छा पूरी नहीं होने पर राजीव नयन लोचन से भर गए। साधक ने फिर पूरे मनोयोग से घोर तपस्या की। आखिरकार शिव को वरदान के लिए मना लिया। तय समय पर साधना का प्रतिफल मिला।

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बहरहाल, जहां तक बात पूर्वानुमान की है, सारा भ्रम रंजन के कारण हुआ। एक हेवीवेट मोहतरमा ने अधूरी सूचना में एक छवि गढ़ दी। लिहाजा रंजन का लाभ लेकर शिगूफे पर जन-मन को यकीन होने लगा। इंतजार बस आदेश का था। शाम होते-होते सबकी धड़कनें तेज थीं। रात आते ही बात बदल गई। पात्र बदल गए। किरदार बदल गए।

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तुम्हारी बिरादरी के सूरमाओं ने तो और गजब कर डाला। पहले से यातायात के मोर्चे पर तैनात हमनाम हाकिम की तस्वीर इंटरनेट पर अपलोड कर दी। बेचारे सुबह से फोन पर सफाई देते घूम रहे हैं। गुरु की बातें समझ में आ चुकी थीं। प्रसंग ने प्रमाण का दामन थामकर भ्रम के अंधियारे को दूर कर दिया था। लिहाजा गुरु के हाथ जोड़े और विदा ली।

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