Hazaribagh : झारखंड के हजारीबाग जिले में बच्चों के रहस्यमय तरीके से लापता होने और बाद में उनके शव मिलने की घटनाओं ने पूरे इलाके में भय और चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। हाल के दिनों में सामने आए दो ब्लाइंड मर्डर केसों में पांच मासूम बच्चों की मौत ने न सिर्फ आम लोगों को झकझोर दिया है, बल्कि पुलिस की कार्यशैली और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।ताजा मामला कटकमदाग थाना क्षेत्र के कूद गांव में किराए के मकान में रहने वाले उत्तर प्रदेश निवासी परिवार से जुड़ा है। परिवार के दो बच्चे—14 वर्षीय तमन्ना और उसका चार वर्षीय भाई रिजवान—इंद्रपुरी चौक से अचानक लापता हो गए थे। पांच दिनों तक तलाश के बाद रविवार को तमन्ना का शव सिंदूर पंचायत भवन के पास एक नाले से बरामद हुआ, जबकि कुछ घंटों बाद सोमवार को उसी क्षेत्र के एक कुएं से रिजवान का शव मिला। पुलिस अभी तक दोनों मौतों के कारणों और इनके पीछे किसी संगठित साजिश की आधिकारिक पुष्टि नहीं कर सकी है।इस घटना ने लोगों को कुछ समय पहले हुए चर्चित पौता जंगल कांड की याद दिला दी है। उस मामले में भी तीन बच्चे अचानक लापता हो गए थे और कई दिनों बाद उनके शव बरामद किए गए थे। शुरुआती जांच में कोई स्पष्ट सुराग नहीं मिलने के कारण वह मामला लंबे समय तक ब्लाइंड मर्डर बना रहा। आज भी कई लोग सवाल उठाते हैं कि यदि शुरुआती स्तर पर जांच और खोज अभियान अधिक प्रभावी होता तो शायद बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।सिंदूर कांड में भी पीड़ित परिवार ने बच्चों के गायब होने की सूचना समय पर पुलिस को दी थी। आरोप है कि पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करने के बजाय परिजनों को अलग-अलग थानों के चक्कर लगवाए। परिवार का कहना है कि प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही दोनों बच्चों की मौत हो चुकी थी। फिलहाल हत्या के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं है और अपराधी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं पैदा कर दी हैं। कुछ लोग किसी संगठित गिरोह की सक्रियता की संभावना जता रहे हैं, जबकि कुछ इसे किसी साइको किलर से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि अपराध विज्ञान के जानकारों का कहना है कि किसी भी घटना को सीरियल किलिंग या साइको किलर से जोड़ने के लिए अपराध की शैली, पीड़ितों का चयन, घटनास्थल के पैटर्न और मनोवैज्ञानिक पहलुओं समेत कई ठोस तथ्यों की जरूरत होती है।इन घटनाओं ने यह भी साबित किया है कि बच्चों के लापता होने के मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दौरान सक्रिय खोजबीन, तकनीकी निगरानी और अंतर-जिला समन्वय के जरिए कई मामलों में बच्चों को सुरक्षित बरामद किया जा सकता है। लेकिन हजारीबाग के दोनों मामलों में शुरुआती कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का मानना है कि यदि गुमशुदगी की शिकायतों को शुरू से गंभीरता से लिया जाता, तो शायद परिणाम कुछ और हो सकते थे।फिलहाल दोनों मामलों की जांच जारी है, लेकिन पांच मासूमों की मौत ने हजारीबाग समेत पूरे झारखंड में बच्चों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
Hazaribagh News: हजारीबाग में पांच मासूमों की मौत से दहशत, दो ब्लाइंड मर्डर केस ने खड़े किए कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर सवाल
हाल के दिनों में सामने आए दो ब्लाइंड मर्डर केसों में पांच मासूम बच्चों की मौत ने न सिर्फ आम लोगों को झकझोर दिया है, बल्कि पुलिस की कार्यशैली और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
9

