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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : कुल करनी की धरनी

Jharkhand Bureaucracy : कुछ बड़े नौकरशाहों का ऐसा दावा है कि नौकरशाही वाले मोहल्ले का एक खिलाड़ी बड़ी शातिर चाल चल रहा है। वर्षों से व्यवस्था को बेदम करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है। बावजूद किसी की मजाल नहीं कि इस पर हाथ डाल दे। ईमानदारी की चादर ओढ़ कर बाहरी बहाली के नाम पर धुआंधार बैटिंग हो रही है। फिर भी सब मौन हैं। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
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Jharkhand Bureaucracy : गुरु को कुछ तो बहुत बुरा लगा था। दफ्तर में काम निपटाते हुए बड़बड़ाते जा रहे थे। ‘अकेले काबिल बचे हैं पूरे सिस्टम में। इनको हर बात में आपत्ति है।’ कुछ देर मौन रहकर मनोभाव समझने के बाद आखिरकार रहा नहीं गया। सो, पूछ लिया- किससे नाराज हैं? गुरु बोले- ‘हैं एक सूरमा। जब से सेवा में आए हैं, तब से फ्रस्टेट ही रहते हैं। पति-पत्नी दोनों का एक ही हाल है। पता नहीं किस बात से खीझे रहते हैं? पूरी व्यवस्था की कमर तोड़कर रखी है। एक-एक कर सबको निपटा रहे।

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इसके बावजूद कोई इन पर हाथ डालना नहीं चाहता। फिर चाहें सहकर्मी-सीनियर हों या हुक्मरान। यह सब करके भी इनका मन नहीं भर रहा। पिछले कुछ समय से हर फाइल में कुछ न कुछ अड़ंगा लगा ही देते हैं।’ जैसे ताक में रहते हों कि फाइल आए और लाल कलम चलाएं। गुरु का सीधा और सपाट उवाच सुनकर लगा, मामला जरूर गंभीर है। ऐसे में तत्काल छेड़ना खतरे से खाली नहीं था। लिहाजा, मनोभाव के साथ एकात्म होने की कोशिश करता रहा। कहा- होते हैं कुछ लोग गुरु, क्या करिएगा? गुरु बोले, यही तो दुख है कि इन महाशय का कोई कुछ नहीं कर रहा। जो कर रहे, यही कर रहे हैं। अकेले एक आदमी ने पूरी व्यवस्था को पंगु बना दिया है।

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बावजूद वर्षों से मनचाही कुर्सी पर जमे हुए हैं। आलम यह है कि वनांचल के हर रायते में दही यही फेंट कर देते हैं। कुल करनी-धरनी इनकी, झेलता पूरा सूबा है। आश्चर्यजनक यह है कि इतना सब होने के बाद भी इन्हें समुचित सुविधा मुहैया कराई जा रही। सूबे के एक ऊंचे वाले सिंहासन पर बैठाए रखा गया है। ऐसा लगता है मानो ‘व्यवधान मंत्री’ का एक अलग पोर्टफोलियो हो। विधायिका से लेकर कार्यपालिका तक परेशान है। फिर भी किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। माजरा कुछ-कुछ समझ में आ रहा था।

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गुरु गजब भड़के थे, सो चुपचाप सुनता रहा। बोले- पढ़ा-लिखा होना अच्छी बात है। नाम के आगे डॉक्टर क्या लगा है, हर फाइल का बेवजह ऑपरेशन कर्तव्य मान बैठे हैं। अब देखो न, पहले जमीन के नाम पर अपनी ही जमात को निपटाया। अब व्यवस्था के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। हाल ही का कारनामा देख लो। न्याय व्यवस्था ने आंखें तरेरीं तो निजाम ने सर्वसम्मति से दो-चार नाम आगे बढ़ा दिए। महोदय ने उस पर भी अड़ंगा लगा दिया। फिर क्या था, फाइल वापस।

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बीच बात दखल देते हुए कहा- गुरु, उनके अपने तर्क हो सकते हैं। गुरु का आवेश कम नहीं हुआ। बोले- इस दुनिया में बड़े-बड़े सिकंदर हुए। सबको यही भ्रम था। दुनिया जीत लेंगे। सब बदल देंगे। हकीकत अब भी जस की तस है। अगर सब कुछ इतनी ही एक्युरेसी से होने लगे तो फिर भला यह यहां क्यों? यह भी सोचने वाली बात है। अब बताओ, इन साहब के साथ ही ऐसा क्यों नहीं है? बड़े-बड़े संस्थान में धड़ल्ले से बाहरी लोगों को बैठाए जा रहे हैं। सारा हिसाब-किताब खुद संभाल रहे हैं।

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कभी किसी ने इनसे पूछा? कभी इनकी फाइल रुकी? कोई बताएगा कि क्या एक प्रदेश अपने संस्थानों के लिए अपने राज्य का मुखिया नहीं चुन सकता? अगर यही जमीनी हालत है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? वर्षों बरस से तो पूरी व्यवस्था पर यही कुंडली मारे बैठे हैं। फिर भला अयोग्यता का ठीकरा किसके सिर फोड़ रहे? गुरु के किसी सवाल का तार्किक जवाब नहीं था। गुरु फाइल पर आंखें गड़ाए थे। गुस्से में गुरु को और लाल करने की हिम्मत नहीं थी। लिहाजा हाथ जोड़े और विदा लिया।

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