
Jamshedpur : झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला अंतर्गत जादूगोड़ा में यूरेनियम खनन और रेडिएशन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसिल) और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) ने वैज्ञानिक आंकड़ों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की है। अधिकारियों के अनुसार, जादूगोड़ा क्षेत्र में प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण का स्तर वैश्विक औसत से भी कम है।
यूसिल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक काचम आनंद राव ने सोमवार को बताया कि करीब छह दशकों से जारी यूरेनियम खनन के बावजूद स्थानीय पर्यावरण पर किसी प्रतिकूल प्रभाव के प्रमाण नहीं मिले हैं। उनके मुताबिक जादूगोड़ा में प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण 2.6 मिलीसीवर्ट प्रतिवर्ष दर्ज किया गया है, जबकि वैश्विक औसत 3.0 मिलीसीवर्ट है।
केरल के तटीय क्षेत्रों से भी कम विकिरण
बीएआरसी के हेल्थ फिजिक्स यूनिट की तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार, केरल के मोनाजाइट रेत वाले तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक विकिरण का स्तर 15.7 मिलीसीवर्ट प्रतिवर्ष तक पाया जाता है। यूसिल का दावा है कि जादूगोड़ा का स्तर इससे काफी कम है।
आनंद राव ने बताया कि टाटा मेमोरियल सेंटर और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) समेत कई संस्थानों के अध्ययनों में स्थानीय बीमारियों और कैंसर को यूरेनियम खनन या रेडिएशन से जोड़ने वाला निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है।
भूजल और टेलिंग पॉन्ड की भी निगरानी
बीएआरसी की निगरानी में जादुगोड़ा, नरवापहाड़ और तुरामडीह क्षेत्रों के भूजल की जांच की गई। यूसिल के अनुसार, पानी में यूरेनियम की मात्रा निर्धारित मानक की तुलना में बेहद कम पाई गई। टेलिंग पॉन्ड के आसपास की मिट्टी और भूजल में भी रेडियोधर्मी तत्वों के रिसाव का प्रमाण नहीं मिला।
कंपनी के मुताबिक खदानों में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाला विकिरण भी परमाणु ऊर्जा नियामक संस्था एईआरबी की निर्धारित सीमा से काफी नीचे है।
घरेलू यूरेनियम से परमाणु ऊर्जा को मजबूती देने की तैयारी
यूसिल के सीएमडी ने कहा कि भारत की परमाणु ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के लिए घरेलू यूरेनियम का उत्पादन महत्वपूर्ण है। कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) के साथ परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है।
उनके अनुसार, इस चरण और आगे बनने वाले रिएक्टरों के लिए घरेलू स्तर पर उत्पादित यूरेनियम की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। भारत के थोरियम आधारित ऊर्जा कार्यक्रम के पूरी तरह आत्मनिर्भर होने तक देश की घरेलू यूरेनियम खदानें अहम भूमिका निभाएंगी।
झारखंड समेत कई राज्यों में खनन परियोजनाओं का विस्तार
राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यूसिल के वास्तविक उत्पादन आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते। कंपनी वर्तमान में देश की घरेलू जरूरतों का करीब 30 से 40 प्रतिशत यूरेनियम ईंधन उपलब्ध कराने का दावा करती है।
भविष्य में उत्पादन बढ़ाने के लिए झारखंड और आंध्र प्रदेश की मौजूदा खदानों के विस्तार के साथ राजस्थान के रोहिल और कर्नाटक में नई ग्रीनफील्ड परियोजनाओं पर भी काम किया जा रहा है।

