
रांची: झारखंड का गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र इस समय राज्य की सियासत का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सुदिव्य कुमार सोनू के असमय निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर अब उपचुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हजारीबाग पहुंचे सत्ता पक्ष और विपक्ष के कद्दावर नेताओं के बयानों ने यह साफ कर दिया है कि गिरिडीह का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है।
JMM को अपनी जीत पर पूरा भरोसा
झारखंड सरकार के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने गिरिडीह सीट को लेकर सत्ता पक्ष का रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। हजारीबाग में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि गिरिडीह हमेशा से झारखंड मुक्ति मोर्चा का मजबूत गढ़ रहा है। पार्टी के नेता सुदिव्य कुमार ने लगातार दो बार (2019 और 2024) यहां से जीत हासिल कर अपनी जड़ें गहरी की थीं। मंत्री योगेंद्र प्रसाद का कहना है कि जैसे ही चुनाव आयोग बिगुल बजाएगा, उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा कर दी जाएगी। विपक्ष चाहे कितनी भी ताकत लगा ले, इस बार भी जीत का परचम झामुमो ही लहराएगा।
NDA गठबंधन में अभी नहीं बनी बात?
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी भी अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने हजारीबाग में स्पष्ट किया कि गिरिडीह उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। हालांकि,पत्रकारों ने जब उनसे एनडीए सहयोगी आजसू के अलग से चुनाव लड़ने की चर्चा पर सवाल पूछा, तो उन्होंने कहा कि आजसू के नेतृत्व से इस संबंध में वार्ता की जाएगी। उनके इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि गिरिडीह सीट को लेकर एनडीए के भीतर फिलहाल सीट शेयरिंग पर पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है और खींचतान की स्थिति बनी हुई है।
आजसू और JLKM बिगाड़ सकते हैं गणित
इस उपचुनाव में केवल जेएमएम और भाजपा की सीधी टक्कर ही नहीं है, बल्कि आजसू और जेएलकेएम की एंट्री ने पूरे मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है। पिछले 2024 के चुनाव आंकड़ों पर नजर डालें तो जेएमएम के सुदिव्य कुमार को 94,042 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को 90,204 वोट मिले थे। यानी हार-जीत का अंतर महज 3,838 वोटों का था।
उसी चुनाव में जेएलकेएम के उम्मीदवार ने 10,787 वोट हासिल कर सबको चौंका दिया था। ऐसे में यह साफ है कि जेएलकेएम का वोट बैंक किसी भी बड़ी पार्टी का समीकरण बिगाड़ने की ताकत रखता है। यदि आजसू भी अलग से अपना उम्मीदवार उतारती है, तो एनडीए के वोटों में बिखराव से भाजपा की राह कठिन हो सकती है।
सुदिव्य की लगन से झामुमो बनी मजबूत
गिरिडीह विधानसभा का इतिहास संघर्ष और वापसी की मिसाल रहा है। 2009 और 2014 में लगातार दो चुनाव हारने के बावजूद सुदिव्य कुमार ने जमीन पर काम करना नहीं छोड़ा। 2014 में भाजपा के निर्भय शाहाबादी ने यहां जीत दर्ज की थी, लेकिन 2019 में सुदिव्य कुमार ने 80,871 वोट लाकर उन्हें 64,987 वोटों पर समेट दिया और पहली बार विधानसभा पहुंचे।
इसके बाद 2024 के चुनाव में सुदिव्य कुमार ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। अब उनके निधन के बाद इस सीट पर विरासत को बचाने और गढ़ पर दोबारा कब्जा जमाने की जंग जारी है। फिलहाल, जैसे-जैसे चुनावी तारीखों का इंतजार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे गिरिडीह की सियासी बिसात पर चालें तेज होती जा रही हैं।

