
अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा…। बरामदे में पांव रखते ही जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियां कानों में पड़ीं। कुछ कदम अंदर की ओर बढ़े तो देखा गुरु अपने पुस्तकालय में बैठे हैं। हाथ में किताब लिए कविता पाठ कर रहे हैं। सामने चाय की प्याली पड़ी है। उपस्थिति का अहसास कराने के लिए ध्यान भंग करना मजबूरी थी। लिहाजा बात अभिवादन के साथ शुरू की।
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गुरुवर प्रणाम! कहां इतनी सुबह-सुबह अध्ययन कार्य में रत हो गए। गुरु को हस्तक्षेप का यह तरीका शायद पसंद आया। बोले- अरे प्रणाम। आओ, आओ। तुम्हारी रुचि की पटकथा है। आराम से बताते हैं। मिजाज देखकर लगा गुरु कुछ बेहद मनोरंजक सुनाने वाले हैं। सामने पड़ी कुर्सी खींच कर बैठ गया। गुरु बोले- आज सुबह-सुबह एक फोन आया। फोन करने वाला व्यक्ति यह जानना चाहता था कि छापा कहां-कहां पड़ा? तुम्हें तो पता ही होगा?
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गुरु की अंतिम पंक्ति उत्तर की अपेक्षा कर रही थी। इसलिए जवाब देना जरूरी था। हां- गुरु सुना तो है। एजेंसी वनांचल की सेहत जांच में जुट गई है। गुरु बोले- हां! बिल्कुल सही पकड़े हो। बताने वाले दावा करते हैं कि सबसे बड़ा खेला सेहत सुधार के नाम पर ही हुआ है। इस पूरे खेल में कैप्टन और वाइस कैप्टन के अलावा लाल फीताशाही वाले कई सूरमाओं ने हाथ साफ किए हैं। लाख कोशिशों के बाद इनके हाथों पर खून के छींटे कुछ न कुछ बच ही गए हैं। अब जबकि जांच के नाम पर पुरानी फाइल खंगाली जा रही हैं। ऐसे में कई लोगों के दिल बैठे जा रहे हैं।
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यह पूरा घटनाक्रम सुनकर कवि हृदय बेचैन हो गया। अचानक ‘प्रसाद’ याद आ गए। कविता की पंक्तियां बरबस गुनगुनाने लगा। इस लिए किताब लेकर बैठ गया। वाक्य पूरा होने के साथ गुरु अपनी तरफ से स्थिति स्पष्ट कर चुके थे। दूसरी तरफ श्रोता के तौर पर मस्तिष्क में कहानी और कविता का परस्पर संबंध स्थापित नहीं कर पा रहा था। जिज्ञासु स्वभाव ने फिर प्रश्न पूछने पर मजबूर कर दिया। गुरु कुछ समझा नहीं? सवाल सुनकर गुरु थोड़े हतप्रभ हो गए। बोले- अरे यार! इतने लंबे समय से कौन सी पत्रकारिता कर रहे हो? यह मधुमय देश भी अरुण का ही था। यहां भी कई अनजान क्षितिजों ने सहारा लिया।
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जबसे छापेमारी की सूचना फिजां में फैली है, ‘अरुण’ से लेकर क्षितिज तक बेचैन हो गए हैं। पता नहीं कब किस खिड़की से कौन सी किरण अंदर आ जाए और कौन से छिपे रहस्य खोलकर रख दे? एक तरफ धन्ना के पास अन्ना बदलने का विकल्प है। दूसरी तरफ सेवानिवृत्ति लाभ गन्ना होने का डर सता रहा है। बात पूरी कर गुरु कुर्सी से खड़े हो गए। लिहाजा आधी-अधूरी समझ लेकर रुखसत होने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। दिमाग में बस गुरु की बात घूम रही थी धन्ना, अन्ना, ‘अरुण’…।

