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Jharkhand, GST Council : कोयले को जीएसटी से बाहर कर उत्पादक राज्यों को वैट लगाने का अधिकार मिले : राधाकृष्ण किशोर

जीएसटी परिषद में झारखंड के राजस्व का मुद्दा

by Nikhil Kumar
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रांची : झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने गुरुवार को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम के समिट रूम में हुई 57वीं जीएसटी परिषद की बैठक में खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व हितों का मुद्दा उठाया। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री एवं जीएसटी परिषद की अध्यक्ष निर्मला सीतारमण ने की। बैठक में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के वित्त मंत्रियों तथा संबंधित अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
किशोर ने कहा कि झारखंड देश की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है। राज्य में देश के करीब 23.27 प्रतिशत कोयला भंडार हैं, लेकिन कोयले के खनन से होने वाली पर्यावरणीय, सामाजिक और पुनर्वास संबंधी दीर्घकालिक जिम्मेदारियां मुख्य रूप से झारखंड को उठानी पड़ती हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा गंतव्य आधारित जीएसटी व्यवस्था में खनिज उत्पादक राज्यों के राजस्व हितों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
वित्त मंत्री ने परिषद के समक्ष कोयले को जीएसटी से बाहर रखने और उत्पादक राज्यों को कोयले पर वैट लगाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि सितंबर 2025 से पहले लागू पांच प्रतिशत की दर के आधार पर उत्पादक राज्य अंतरराज्यीय कारोबार पर दो प्रतिशत सीएसटी लगा सकें, तो इससे खनिज उत्पादक राज्यों का राजस्व मजबूत होगा। साथ ही बिजली उत्पादन पर कर का बोझ कम होने की संभावना है।
उन्होंने जीएसटी में राज्यवार और एचएसएनवार स्रोत-गंतव्य-आईटीसी-निपटान विवरण उपलब्ध कराने की मांग की। किशोर के अनुसार, इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि खनिज उत्पादक राज्यों से होने वाली आपूर्ति और उससे जुड़े कर राजस्व का वास्तविक प्रभाव क्या है।
किशोर ने झारखंड के राजस्व पर पड़े विभिन्न वित्तीय प्रभावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने जीएसटी दरों के युक्तिकरण से करीब 4,000 करोड़ रुपये, वीबी-जी राम-जी की फंडिंग व्यवस्था में बदलाव से करीब 4,000 करोड़ रुपये और एमएमडीआर कानून में बदलाव से करीब 14,000 करोड़ रुपये के असर का दावा किया। जीएसटी मुआवजा उपकर समाप्त होने से राज्य को करीब 2,500 करोड़ रुपये सालाना राजस्व अंतर का अनुमान भी बताया।
उन्होंने खनिज उत्पादक राज्यों के लिए ‘रिसोर्स-ओरिजिन एंड इकोलॉजिकल इक्वलाइजेशन फ्रेमवर्क’ बनाने का प्रस्ताव दिया। इसमें खनिज उत्पादन, राज्य से बाहर भेजे जाने वाली मात्रा, वन एवं भूमि का उपयोग, पर्यावरणीय नुकसान, जल एवं प्रदूषण का बोझ, विस्थापित आबादी, अनुसूचित एवं आदिवासी क्षेत्र तथा खनन के बाद पुनर्वास और आर्थिक संक्रमण जैसे मानकों को शामिल करने की मांग की।

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