
रांची: पुलिस जांच से असंतुष्ट व्यक्ति को सीधे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के बजाय पहले उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाना चाहिए। मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी दर्ज कराने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराने का अधिकार है। झारखंड हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की है।
जस्टिस रंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने धनबाद थाना कांड संख्या 81/2026 में नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर लालन कुमार उर्फ लालन कुमार मलाकार की ओर से दायर क्रिमिनल रिट याचिका निष्पादित कर दी। अदालत ने याचिकाकर्ता को उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सकरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2008) का हवाला दिया। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि पुलिस उचित जांच नहीं करती है तो पीड़ित व्यक्ति पहले संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत कर सकता है। इसके बाद भी राहत नहीं मिलने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) के तहत आवेदन दे सकता है। इसके अलावा धारा 200 के तहत आपराधिक शिकायत भी दर्ज करा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मजिस्ट्रेट प्राथमिकी दर्ज कराने और जांच की निगरानी कर उचित जांच सुनिश्चित करने का निर्देश दे सकता है। ऐसे मामलों में सीधे हाईकोर्ट पहुंचने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका निष्पादित करते हुए याचिकाकर्ता को वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी।
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