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Professor Sunita Gudiya : मिलीजुली संस्कृति के पैरोकार थे राही मासूम रजा : प्रो. सुनीता गुड़िया

by Rakesh Pandey
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करीम सिटी कॉलेज के हिंदी विभाग में संगोष्ठी आयोजित

जमशेदपुर : Karim City College :  साकची स्थित करीम सिटी कॉलेज के हिंदी विभाग में सोमवार को साहित्यकार व महाभारत धारावाहिक के पठकथा लेखक डॉ. राही मासूम रजा की जयंती मनायी गयी। इस अवसर पर एक विभागीय सेमिनार का आयोजन किया गया।

इसमें अतिथि वक्ता जमशेदपुर वर्कर्स कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. सुनीता गुड़िया उपस्थित थीं। विषय प्रवेश कराते हुए विभाग की प्रो. डॉ. संध्या सिन्हा ने कहा कि डॉ. राही मासूम रजा अपने को गंगा का बेटा कहते हैं।

डॉ. राही मासूम रजा एक ऐसे रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जिनकी रचनात्मक उम्र संस्कृत से उर्दू तक और महाकाव्य से गजलों तक की रही है। भारतीय संस्कृति को गहराई से पहचानने वाले डॉ. राही मासूम रजा की रचना में समन्वय का सरोकार रहता है।

अतिथि वक्ता प्रो. सुनीता गुड़िया ने कहा कि उपन्यास से लेकर काव्य और गजल से लेकर फिल्म संवाद तक कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं, जहां डा. राही मासूम रजा ने अपनी मजबूत समन्वयवादी विचारधारा और शैली के साथ हस्तक्षेप न किया हो। महाभारत के कभी न भुलाए जा सकने वाले डायलॉग्स आज भी उनकी अद्भुत शैली का रंग बिखेरते हैं।

डॉ राही मासूम रजा कट्टरता के सख्त विरोधी थे। साथ ही अपने अंदर एक मूल्यवान सांस्कृतिक पहचान को समेटे हुए थे। विभाजन से आहत डॉ मासूम राही रजा हमेशा मिलीजुली संस्कृति के पैरोकार रहे हैं।

यही कारण था कि सिर्फ रचना के स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी वे सामाजिक समानता के प्रति संघर्षरत रहे। यही कारण है कि एक तरफ डॉ. राही मासूम रजा, आधा गांव’ लिखते हैं, तो दूसरी तरफ महाभारत टीवी सीरियल की पटकथा लिखते हैं।

कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सुभाषचंद्र गुप्ता ने कहा कि डॉ. रही मासूम रजा व्यवस्था के खिलाफ बुलंद आवाज में बोल सकते थे। वे भारतीय साझी संस्कृति और जीवन शैली के बहुत बड़े अध्येता थे।

संगोष्ठी में कई छात्र-छात्राओं ने डॉ राही मासूम रजा की शायरी का पाठ किया और चार विद्यार्थियों ने उनके एक-एक उपन्यास पर चर्चा की। छात्रा निशा भट्टाचार्जी ने संचालन और विभाग के प्रो. (डॉ.) फिरोज आलम ने धन्यवाद ज्ञापन किया। संगोष्ठी में हिंदी विभाग के विभिन्न सेमेस्टर के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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