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NITISH KUMAR IFTAR PARTY : आज नीतीश कुमार के आवास पर इफ्तार पार्टी, जमीयत उलमा-ए-हिंद की अपील- ‘शामिल न हों मुसलमान’

by Rakesh Pandey
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पटना : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास पर हर साल आयोजित होने वाली इफ्तार पार्टी इस बार सियासी दृष्टिकोण से खास चर्चा का विषय बन गई है। आमतौर पर इस इफ्तार पार्टी में सभी समुदायों के लोग शामिल होते हैं, इस बार बिहार के अल्पसंख्यक संगठनों ने इस आयोजन का बहिष्कार करने का एलान किया है। यह विरोध खास तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा वक्फ संशोधन बिल के समर्थन को लेकर उठ खड़ा हुआ है। इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री की राजनीतिक स्थिति को एक नई दिशा में मोड़ दिया है, खासकर चुनावी साल में जब बिहार में विधानसभा चुनावों की तारीखें नजदीक आ रही हैं।

वक्फ संशोधन बिल को लेकर नाराजगी

वक्फ संशोधन बिल को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का समर्थन, अल्पसंख्यक समुदाय के बीच नाराजगी का कारण बना है। बिहार के प्रमुख अल्पसंख्यक धार्मिक संगठन इस बिल के समर्थन के खिलाफ हैं और इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों से असंतुष्ट हैं। इसके परिणामस्वरूप, इन संगठनों ने नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी में शिरकत करने का विरोध करने का निर्णय लिया है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद का विरोध

बिहार के मुस्लिम संगठनों में जमीयत उलमा-ए-हिंद सबसे प्रमुख संस्था है, जिसने इस मामले में सक्रिय रूप से विरोध किया है। मौलाना अरशद मदनी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख, ने नीतीश कुमार के अलावा अन्य नेताओं जैसे चंद्रबाबू नायडू और चिराग पासवान की इफ्तार पार्टियों का भी बहिष्कार करने की अपील की है। उनका यह फरमान बिहार में राजनीतिक बवंडर का कारण बन चुका है।

इसके अलावा, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, इमारत-ए-शरिया, जमीयत अहले हदीस, जमात-ए-इस्लामी हिंद, खानकाह मुजीबिया और खानकाह रहमानी जैसे बड़े मुस्लिम संगठनों ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है।

नीतीश कुमार के लिए चुनौतीपूर्ण समय

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हर साल रमजान के महीने में अल्पसंख्यक समुदाय को एक मजबूत संदेश देने के लिए इफ्तार पार्टी का आयोजन करते हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन को मजबूत करने का एक माध्यम भी बनता है। लेकिन, इस बार चुनावी वर्ष और वक्फ बिल को लेकर उठी असहमति ने उनके लिए नई चुनौती पेश की है।

बिहार में अल्पसंख्यक वोट बैंक का एक महत्वपूर्ण स्थान है और लगभग 17% अल्पसंख्यक राज्य की कुल जनसंख्या में शामिल हैं। ऐसे में, यदि अल्पसंख्यक समुदाय का समर्थन नहीं मिलता, तो नीतीश कुमार के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इस बार उनकी राजनीतिक धारणा का परीक्षण होगा, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम मतदाता नीतीश कुमार से नाराज नजर आए हैं।

मुस्लिम संगठनों को मनाने की कोशिश

नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू के नेता इस मुश्किल घड़ी में मुस्लिम संगठनों को मनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान को इस मुद्दे पर सक्रिय रूप से संवाद साधने के लिए नियुक्त किया है। इसके अलावा, नीतीश कुमार खुद भी मुस्लिम समुदाय के नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं और अपनी नीतियों के संदर्भ में उनके विचार जानने का प्रयास कर रहे हैं।

हालांकि, इस विरोध के बावजूद यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नीतीश कुमार इन संगठनों को अपने साथ जोड़ने में सफल होते हैं या उनका यह विरोध आगामी चुनावों में उनकी राजनीतिक स्थिति को प्रभावित करेगा।

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