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Hindi Poetry : हिंदी कविता : जब हम बूढ़े हो जाएँगे

by Vivek Kumar Shukla
poem
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एक दिन जब हम बूढ़े हो जाएँगे
तुम्हारे बालों में चाँदनी चमकेगी
और मेरे हाथ काँपेंगे
प्यार में पड़े
सत्रह साला लड़के की तरह
कैलेंडर दिखाएँगे तारीख़
जाने किस साल की
पर मुझे पता है
कि तुम अचानक हँसोगी
और कमरें में भर जाएगा उजाला
तुम देखोगी मेरी आँखों में
और कैलेंडर के पन्ने फड़फड़ाएँगे
और मैं पहुँच जाऊँगा
फ़्लमिंगो के देश में सालों पहले

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जहाँ पहली बार मेरे हाथ काँपे थे

चिट्ठियाँ

मैंने कई चिट्ठियाँ
तुम्हारे नाम लिख रखी हैं
चिट्ठियाँ जो दराज़ में
ठिठुर रही हैं

शब्द उन चिट्ठियों के
गड़ते है
भेड़ के ऊन वाली कम्बल की तरह
जब रात मैं अपने पछतावे बिछा सोता हूँ
तुम से कभी नहीं कहे
चिट्ठियों में लिखे शब्द
कभी नहीं भेजी चिट्ठियाँ
डरता रहा निम्मी!
कि
मेरी ज़बान काली है
कि
कहीं सच न हो जाए वो शब्द
जो मैंने सोचे
लिखे
पर कभी कहे नहीं!

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