
फीचर डेस्क : रक्षाबंधन हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। यह पर्व भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और पारस्परिक रक्षा के संकल्प को मजबूत करने का अवसर माना जाता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुख, स्वास्थ्य तथा समृद्ध जीवन की कामना करती है। भाई भी बहन की रक्षा, सम्मान और सुखी जीवन के लिए संकल्प व्यक्त करता है।
वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा। धार्मिक परंपराओं में इस दिन राखी बांधने की विधि के साथ शुभ समय, भद्रा काल और रक्षासूत्र के महत्व को भी विशेष माना गया है। रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के बीच उपहारों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं माना जाता बल्कि इसे पारिवारिक संस्कार, स्नेह और कर्तव्य की भावना से जुड़ा पर्व माना गया है।
रक्षाबंधन 2026 का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
सनातन संस्था की बबीता गांगुली ने कहा कि रक्षाबंधन से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें माता लक्ष्मी और दानवराज बलि का प्रसंग प्रमुख है। मान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी ने बलि को रक्षासूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बनाया और इसके बाद भगवान श्रीविष्णु को मुक्त कराया।
रक्षाबंधन से संबंधित एक अन्य प्रसंग देवताओं और दैत्यों के बीच हुए युद्ध से जुड़ा है। कथा के अनुसार, युद्ध के समय इंद्राणी ने गुरु बृहस्पति के मार्गदर्शन में देवराज इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था। इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इन कथाओं में रक्षासूत्र को सुरक्षा, मंगलकामना और विजय के प्रतीक के रूप में देखा गया है।
भविष्यपुराण में भी रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है। इसमें इस पर्व को प्रारंभिक रूप से राजाओं से संबंधित बताया गया है। समय के साथ रक्षाबंधन समाज के विभिन्न वर्गों में भाई-बहन के पवित्र संबंध और पारस्परिक स्नेह के पर्व के रूप में व्यापक रूप से प्रचलित हुआ।
रक्षासूत्र बांधने का मंत्र और उसका अर्थ
रक्षाबंधन के अवसर पर रक्षासूत्र बांधते समय एक पारंपरिक मंत्र का उच्चारण किया जाता है। यह मंत्र दानवराज बलि से संबंधित है और इसमें रक्षासूत्र के माध्यम से सुरक्षा की कामना की जाती है।
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र का भावार्थ है कि जिस रक्षासूत्र से महाबली दानवराज बलि को बांधा गया था, उसी रक्षासूत्र से भाई की कलाई पर रक्षा का सूत्र बांधा जा रहा है। यह रक्षासूत्र भाई की रक्षा करे और अपने उद्देश्य से कभी विचलित न हो।
राखी बांधने का आध्यात्मिक और भावनात्मक महत्व
रक्षाबंधन विशेष रूप से भाई-बहन के रिश्ते की मर्यादा और पवित्रता को याद दिलाने वाला पर्व माना जाता है। यह संबंधों में सम्मान, आत्मीयता और विश्वास बनाए रखने का संदेश देता है। समय के साथ इस त्योहार का सामाजिक स्वरूप भी व्यापक हुआ है, लेकिन इसके मूल में पारिवारिक संबंधों की मजबूती और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना बनी हुई है।
राखी में चावल और रेशमी धागे का महत्व
परंपरागत रूप से राखी बनाने में रेशमी धागे और चावल का उपयोग किया जाता है। धार्मिक परंपराओं में चावल को शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। रक्षासूत्र के साथ इन सामग्रियों का प्रयोग भाई के लिए शुभकामना और मंगलभाव प्रकट करने की परंपरा से जुड़ा है।
राखी की बाहरी सजावट से अधिक उसके पीछे मौजूद भावना को महत्वपूर्ण माना जाता है। सादगीपूर्ण और धार्मिक भावनाओं के अनुरूप राखी का चयन करने की परंपरा को इसी दृष्टि से देखा जाता है।
रक्षाबंधन में भद्रा काल का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन पर भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। शास्त्रीय परंपरा में भद्रा रहित समय में रक्षाबंधन मनाने का निर्देश मिलता है। धर्मसिंधु जैसे ग्रंथों में भी रक्षाबंधन के लिए भद्रा रहित समय को महत्व दिया गया है।
इस मान्यता के अनुसार भद्रा काल में राखी बांधने से बचना चाहिए। इसलिए रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने से पहले स्थानीय पंचांग के अनुसार भद्रा की स्थिति और शुभ समय की जानकारी लेना महत्वपूर्ण माना जाता है।
देवताओं की तस्वीर वाली राखी से जुड़ी मान्यता
रक्षाबंधन के दौरान बाजार में विभिन्न प्रकार की राखियां उपलब्ध रहती हैं। इनमें देवी-देवताओं के चित्र वाली राखियां भी शामिल होती हैं। धार्मिक दृष्टि से ऐसी राखियों को लेकर यह मान्यता व्यक्त की जाती है कि उपयोग के बाद उनका उचित तरीके से सम्मानपूर्वक निपटान होना चाहिए।
परंपरागत धार्मिक दृष्टिकोण के अनुसार राखी उतारने के बाद उसे इधर-उधर फेंकने के बजाय सम्मानपूर्वक विसर्जित करना उचित माना जाता है। इसी कारण सादगीपूर्ण, सात्त्विक और धार्मिक भावनाओं के अनुरूप राखी का चयन करने पर जोर दिया जाता है।

