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Shardiya Navratri Day 2 : शारदीय नवरात्र 2026 का दूसरा दिन आज, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का जानें शुभ मुहूर्त, विधि, कथा और प्रिय भोग

by Rakesh Pandey
Shardiya Navratri Day 2
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Shardiya Navratri 2026 Day 2 : फीचर डेस्क : शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जा रही है। नवरात्र के नौ दिनों में प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की आराधना का विधान है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा तप, संयम, साधना और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से मन को शांति मिलती है और भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। इस दिन देवी को चीनी, दूध और सफेद मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है। ऐसे में आइए जानते हैं शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन का शुभ मुहूर्त, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, प्रिय भोग, पौराणिक कथा और आरती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी।

शारदीय नवरात्र 2026 के दूसरे दिन का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए द्वितीया तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन पूजा-पाठ के लिए शुभ समय का ध्यान रखते हुए श्रद्धालु देवी की आराधना कर सकते हैं।

द्वितीया तिथि प्रारंभ : 11 अक्टूबर 2026, रात 9 बजकर 32 मिनट से।

द्वितीया तिथि समाप्त : 12 अक्टूबर 2026, रात 10 बजकर 14 मिनट तक।

अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक।

अभिजीत मुहूर्त में पूजा-अर्चना करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और स्थानीय पंचांग के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी की आराधना कर सकते हैं। धार्मिक परंपरा में पूजा के दौरान स्वच्छता, श्रद्धा और मन की एकाग्रता को विशेष महत्व दिया गया है।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि : दूसरे दिन ऐसे करें आराधना

शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र करें। मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर दीपक जलाएं। देवी को फूल, अक्षत, चंदन और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।

इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी को चीनी, दूध या सफेद मिठाई का भोग लगाएं। श्रद्धालु देवी के मंत्रों का जाप करें और मां ब्रह्मचारिणी की कथा का पाठ करें। पूजा के दौरान देवी से सुख, शांति, धैर्य और जीवन में आने वाली बाधाओं का सामना करने की शक्ति देने की प्रार्थना करें। अंत में मां ब्रह्मचारिणी की आरती करें और परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद वितरित करें।

नवरात्रि में पूजा करते समय अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं का पालन भी किया जा सकता है।

मां ब्रह्मचारिणी को कौन-सा भोग लगाएं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी को चीनी का भोग लगाना विशेष फलदायी माना जाता है। इसके अलावा दूध, दही, घी, शहद और चीनी से तैयार पंचामृत अर्पित किया जा सकता है। दूध से बनी खीर, पेड़ा और अन्य सफेद मिठाइयां भी देवी को चढ़ाने की परंपरा है।

मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी को श्रद्धापूर्वक भोग लगाने और उनकी आराधना करने से भक्तों को मानसिक शांति तथा आत्मबल प्राप्त होता है। पूजा के बाद भोग को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। भोग तैयार करते समय स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।

मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने हिमालयराज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। उन्हें भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा थी। इसके लिए उन्होंने नारद मुनि के मार्गदर्शन में कठोर तपस्या शुरू की। देवी ने लंबे समय तक कठिन साधना की और अनेक कष्ट सहते हुए अपनी आराधना जारी रखी।

कथा के अनुसार, तपस्या के शुरुआती चरण में मां ब्रह्मचारिणी ने केवल फल और कंद-मूल खाकर समय बिताया। इसके बाद उन्होंने जमीन पर गिरे हुए बिल्व पत्रों का सेवन किया। लंबे समय तक तपस्या करने के बाद उन्होंने बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया और निर्जल तथा निराहार रहकर साधना में लीन हो गईं।

देवी की इस कठोर तपस्या से उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया। उनकी साधना और अटूट संकल्प को देखकर देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और मुनियों ने उनकी प्रशंसा की। धार्मिक कथा के अनुसार, देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने का आशीर्वाद मिला। कठोर तप और ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा।

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप साधना, त्याग, संयम और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा से जुड़ी कथा भक्तों को कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देती है।

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप और धार्मिक महत्व

मां ब्रह्मचारिणी को नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक चित्रण में देवी के एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडल रहता है। उनका स्वरूप तपस्या, ज्ञान, साधना और आत्मसंयम का प्रतीक है। नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा करने का उद्देश्य जीवन में धैर्य, आत्मविश्वास और संकल्प की भावना को मजबूत करना माना जाता है।

नवरात्र के दौरान श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास, पूजा-पाठ और मंत्र जाप करते हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना के माध्यम से भक्त आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक स्थिरता की कामना करते हैं।

मां ब्रह्मचारिणी की आरती

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के अंत में उनकी आरती करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी प्रचलित आरती का पाठ कर सकते हैं। आरती के दौरान दीपक जलाकर देवी का स्मरण किया जाता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, कथा श्रवण और भोग अर्पित करने का विशेष धार्मिक महत्व है। श्रद्धालु इस दिन देवी के तपस्विनी स्वरूप का स्मरण करते हुए जीवन में धैर्य, अनुशासन और दृढ़ संकल्प अपनाने का संदेश ग्रहण करते हैं।

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