
Jamshedpur : सुवर्णरेखा और खरकई नदी में लकड़ी के पटरे जोड़कर बनाई गई कमजोर नावों से मछली पकड़ने और बालू निकालने का काम लोगों की जान जोखिम में डाल रहा है। नावों की मजबूती, संतुलन और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामों के बिना नदी में उतरना कभी भी बड़े हादसे की वजह बन सकता है। सुवर्णरेखा नदी में 24 सितंबर की रात नाव पलटने से दो युवकों के लापता होने की घटना इस खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करती है। हादसे के 14 दिन बाद भी बारीडीह के मीरा पथ निवासी अमित कुमार उर्फ गजनी और जिला स्कूल रोड निवासी अमित कुमार उर्फ बिट्टू का कोई सुराग नहीं मिला है।
पटरे जोड़कर बनी नावों पर जोखिम भरा सफर
सुवर्णरेखा और खरकई नदी में कई जगह लकड़ी के पटरे जोड़कर तैयार की गई नावों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनसे लोग मछली पकड़ने और बालू निकालने के लिए नदी में जाते हैं। नावों की बनावट और उनकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। तेज बहाव, जलस्तर में बदलाव या नाव पर संतुलन बिगड़ने की स्थिति में इनके पलटने का खतरा बना रहता है। इसके बावजूद इन नावों के इस्तेमाल के दौरान सुरक्षा के जरूरी उपायों की उपलब्धता स्पष्ट नहीं है।
रात में नदी से नाव के जरिए निकाली जाती है बालू
जमशेदपुर में स्वर्णरेखा नदी से दो मुहानी घाट और बारीडीह के आसपास के इलाके में बालू निकाली जाती है। बालू निकालने के लिए अवैध तरीके से बालू लकड़ी के पटरों को जोड़ कर बनाई गई असुरक्षित नावों का इस्तेमाल किया जाता है। यह काम शहर में कई साल से हो रहा है। इसकी जानकारी पुलिस से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक को है। मगर, कभी भी इस खतरनाक खेल को खत्म कराने की कोशिश नहीं की गई है। इसी का नतीजा रहा कि बारीडीह में ऐसी ही टेंपोरेरी नाव पलट गई और दो लोग लापता हो गए।
जमशदेपुर में एनडीआरएफ का ऑफिस नहीं होने से दिक्कत
पूर्वी सिंहभूम जिले में जब भी कोई नदी में डूबता है तो पहले तो स्थानीय गोताखोर लगा कर उनकी तलाश की जा जाती है। इसके बाद अगर मरने वाला हाईप्रोफाइल व्यक्ति है या उसके पीछे कोई बड़ा नेता है तो रांची से एनडीआरएफ बुलाई जाती है। रांची से एनडीआरएफ के आने में वक्त लगता है। इसलिए, लोग मांग कर रहे हैं कि एनडीआरएफ का दफ्तर जमशेदपुर में स्थापित किया जाए ताकि इस तरह की आपदा होने पर फौरन एनडीआरएफ की मदद मिल सके।
दो के लापता होने के बाद भी नहीं चेत रहा प्रशासन
24 सितंबर की रात गजनी और बिट्टू अपने साथी विक्की के साथ इसी तरह की नाव से सुवर्णरेखा नदी में मछली पकड़ने गए थे। बताया जाता है कि नदी के बीच नाव का संतुलन बिगड़ गया और वह पलट गई। विक्की किसी तरह तैरकर बाहर निकल आया, लेकिन गजनी और बिट्टू तेज धार में बह गए। दोनों की तलाश अब तक जारी है, जबकि उनके परिवार अनिश्चितता और इंतजार के बीच दिन काट रहे हैं।
अब तक नहीं बुलाई गई एनडीआरएफ
दोनों युवकों के लापता होने के 14 दिन बाद भी परिवारों को कोई जानकारी नहीं मिली है। बिट्टू के बुजुर्ग पिता अवधेश साहू खुद नाव लेकर नदी में बेटे की तलाश कर रहे हैं। परिजन बहरागोड़ा तक नदी के किनारे खोजबीन कर चुके हैं, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है। एक ओर परिवार अपने बच्चों की सुरक्षित वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है, तो दूसरी ओर नदी में इस्तेमाल हो रही नावों की सुरक्षा का सवाल भी गंभीर होता जा रहा है।
सुरक्षा जांच और लाइफ जैकेट की जरूरत
सुवर्णरेखा और खरकई नदी में ऐसी नावों के इस्तेमाल की सुरक्षा के लिहाज से जांच जरूरी है। नावों की मजबूती, उनकी भार क्षमता और संतुलन का आकलन करने के साथ लाइफ जैकेट जैसे सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। नदी में काम करने वाले लोगों को तेज बहाव और आपात स्थिति में बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करना भी आवश्यक है।
गजनी और बिट्टू के लापता होने की घटना चेतावनी है कि नदी में कामकाज के दौरान सुरक्षा की अनदेखी कितनी भारी पड़ सकती है। संबंधित विभागों को समय रहते ऐसी नावों के इस्तेमाल की जांच कर जरूरी कदम उठाने चाहिए, ताकि किसी दूसरे परिवार को अपनों की तलाश में इसी तरह भटकना न पड़े।

