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Gaur Chandrika Kirtan : नववर्ष पर गौर चंद्रिका से होता है गौरांग प्रभु का आह्वान, संकीर्तन से गूंज उठता है झारखंड

by Yugal Kishor
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दुमका : झारखंड के दुमका स्थित एएन कॉलेज की बांग्ला साहित्य की व्याख्याता प्रो. मेनका घोष बताती हैं कि बंगाली नववर्ष के प्रथम माह वैशाख में राज्य के बंगभाषी गांवों में एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा जीवंत हो उठती है।

चैतन्य महाप्रभु के झारखंड आगमन की स्मृति

प्रो. मेनका बताती हैं कि चैतन्य चरितामृत में वर्णित श्लोक “एतोदिने उत्तरिला प्रभु झारिखण्ड देशे” का ऐतिहासिक महत्व है। इस श्लोक में प्रयुक्त “झारिखण्ड” शब्द से ही वर्तमान राज्य का नाम “झारखंड” पड़ा। कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन करते हुए इसी भूमि पर पदार्पण किया था, जिसकी स्मृति आज भी संकीर्तन मंडलियों में संजोई जाती है।

गौर चंद्रिका : संकीर्तन की मंगल बेला का आह्वान

गौर चंद्रिका एक विशेष प्रकार का कीर्तन होता है, जिसमें गौरांग प्रभु और नित्यानंद का आह्वान किया जाता है। इसकी शुरुआत होती है भावपूर्ण गीत से, “एसो हे गौरांग प्रभु संकीर्तन माझे, भाई निताई के संगे…” इस गीत के माध्यम से भक्तगण गौरांग और निताई को आमंत्रित करते हैं कि वे संकीर्तन स्थल पर पधारें।

कीर्तन की परंपरा कैसे निभाई जाती है?

संकीर्तन का शुभारंभ गौर मंदिर या नाटशाला से होता है। तुलसी मंडप की परिक्रमा के बाद संकीर्तन मंडली गृहस्थों के घरों में प्रवेश करती है। वहां छोला और गुड़ का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। यह क्रम पूरे वैशाख महीने गांव-गांव चलता है।

श्रीकृष्ण लीला और कीर्तन की विविध शैलियां

प्रो. मेनका घोष बताती हैं कि यह परंपरा महज गीत-गान नहीं बल्कि आध्यात्मिक अनुष्ठान है जिसमें श्रीकृष्ण लीला की संगीतमय प्रस्तुति होती है।

कीर्तन के प्रकार

नाम कीर्तन : श्रीकृष्ण के नामों का उच्चारण कर भावविभोर वातावरण।
लीला कीर्तन : भगवान की बाल-लीला से लेकर व्यध के द्वारा वध तक की घटनाओं का गायन।
बेड़ा कीर्तन : मंदिर या तुलसी मंडप की परिक्रमा करते हुए कीर्तन।
वंदना कीर्तन : गुरु, गौरांग, पंच तत्व, राधा-कृष्ण आदि की वंदना।
प्रार्थना कीर्तन : तिल, तुलसी पत्र और जल के साथ आत्मनिवेदन।
आरती कीर्तन : मंगला आरती (प्रातःकाल), भोग आरती (दोपहर), संध्या आरती (सायं काल)।
अधिवास कीर्तन : अष्टयाम की शुरुआत का कीर्तन।

जयकारों के साथ संकीर्तन का समापन

कीर्तन समाप्त होने के पश्चात मंडली गौरांग मंदिर लौटती है और “गोविंद बोलो जय राधा राधा…” जैसे भावपूर्ण जयकारों के साथ संकीर्तन की पूर्णाहुति होती है।

आत्मशांति प्रदान करनेवाली एक जीवंत परंपरा

प्रो. मेनका घोष बताती हैं कि 15वीं से 17वीं सदी के बीच श्रीकृष्ण कीर्तन की यह धारा बंगाल और झारखंड क्षेत्र में प्रवाहित हुई थी। आज भी यह परंपरा झारखंड के बंगभाषी गांवों में वैशाख माह भर श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाती है।

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