जमशेदपुर : साहित्य, सिनेमा व कला को समर्पित संस्था सृजन संवाद की 161वीं गोष्ठी का आयोजन 22 अप्रैल को ऑनलाइन किया गया। यह सत्र घुमक्कड़ों के नाम रहा, जिनमें सतीश जायसवाल, महेश कटारे व संजय शेफर्ड ने अपने अनुभव साझा किए। उनकी बातों को सुनते हुए दर्शक-श्रोता भी अलग दुनिया में खो गए।
कार्यक्रम स्ट्रीमयार्ड पर हुआ और फेसबुक लाइव के जरिए प्रसारण किया गया। साहित्य और कला जगत से जुड़े कई जानी-मानी हस्तियों ने इसमें भाग लिया। पैनल का संचालन वैभव मणि त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. विजय शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसके बाद डॉ. प्रियंका सिंह ने वक्ताओं का परिचय देते हुए बताया कि अस्सी पार के सतीश जायसवाल जी की कई किताबें प्रकाशित हैं। पत्रकार,-कवि-व घुमक्कड़ जायसवाल जी को कई सम्मान प्राप्त हैं। दूसरे वक्ता महेश कटारे जाने-माने साहित्यकार हैं। ग्वालियर निवासी कटारे जी की उपन्यास सहित अन्य विधाओं पर कई किताबें प्रकाशित हैं। तीसरे वक्ता युवा संजय शेफ़र्ड घुम्मकड़ी के साथ-साथ लेखन करते हैं। वे दुनिया के प्रसिद्ध ट्रैवेल ब्लॉगर में शामिल हैं।
वैभव मणि त्रिपाठी के प्रश्न का उत्तर देते हुए सतीश जायसवाल ने बताया कि जब वे भारत से बर्मा की सीमा में प्रवेश कर रहे थे, तो मैनार नदी में उन्होंने सूर्यास्त होते देखा और उन्हें लगा सूर्य नदी में स्नान कर रहा है, इसीलिए उन्होंने उत्तर-पूर्व में अपनी यात्रा किताब का नाम दिया ‘सूर्य का जलावतरण’। मणिपुर की यात्रा के पहले उन्होंने किताब लिखने की बात नहीं सोची थी, यह प्रदेश उन्हें बहुत कोमल लगा, आज के मणिपुर’ को देख कर चिंता होती है। पूर्वोत्तर की यात्रा पर ही उनकी किताब ‘सूर्य का जलावतरण है। इसे लिखने में उन्हें दस वर्ष का लम्बा समय लगा।
घुमक्कड़ महेश कटारे ने बताया कि वे अपने लिखने की सामग्री जुटाने केलिए यात्रा करते हैं। ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव के कहने पर उन्होंने फ़ूलन देवी पर लिखने के लिए चंबल की यात्रा की थी। कई खतरे उठाए और उपन्यास ‘काली धार’ लिखा। उन्होंने ‘देस बिदेस दरवेश’ के लेखन एवं उससे संबंधित यात्राओं की भी चर्चा की। यात्रा वृतांत पर आधारित उनकी एक अन्य किताब का नाम है, ‘पहियों पर रात-दिन’। सारी यात्राएं उन्होंने अपने खर्च पर की हैं, अत: कई बार चाह कर भी यात्रा नहीं कर पाते हैं। उन्होंने यह शेर सुनाया : सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहां।
गिरिराज किशोर ने ‘पहला गिरमिटिया’ और विष्णु प्रभाकर ने ‘आवारा मसीहा’ के लिए खूब यात्राएं कीं। अमृतलाल नागर भी लिखने केलिए यात्रा करते थे। मगर संजय शेफ़र्ड यात्राएं यात्रा के लिए करते हैं, इसके लिए उन्होंने लगी लगाई नौकरी छोड़ी और वे घूमना-लिखना साथ-साथ करते हैं। संजय गरेड़िया समुदाय से आते हैं और अब भेड़ों के नहीं शब्दों के गरेडिया हैं। उनके भीतर का गरेड़िया भाव इतना प्रबल है कि वे घूमे बिना नहीं रह पाते हैं। घुमक्कड़ केवल आज की चिंता करता है, आने वाले कल की नहीं, ऐसा उन्होंने अपने अनुभव से बताया।
तीनों घुमक्कड़ों के अनुभव बहुत समृद्ध हैं, उनके द्वारा साझा किए अनुभवों से दर्शक-श्रोता भी खूब समृद्ध हुए। कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. विजय शर्मा ने सभी वक्ताओं के अलावा सफ़ल संचालन के लिए वैभव मणि त्रिपाठी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने प्रियंका सिंह, तकनीकी टीम व दर्शकों का भी आभार जताया।
इनकी उपस्थिति भी रही उल्लेखनीय
संगोष्ठी में देश-विदेश से दर्शक-श्रोता जुड़े, जिनमें जमशेदपुर से साहित्य कला फाउंडेशन की डॉ. क्षमा त्रिपाठी, डॉ. मीनू रावत, अरविंद तिवारी, आभा विश्वकर्मा, गोरखपुर से उमा उपाध्याय, अनुराग रंजन, बेंगलुरु से पत्रकार अनघा मारीषा, कवि परमानंद रमण, पुणे से सिने-विश्लेषक एवं इतिहासकार मनमोहन चड्ढ़ा, जौनपुर से अश्वनी त्रिपाठी आदि सम्मिलित हुए।
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