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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : आईपीएल नहीं, ‘आईए बनाम आईपी’

Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही वाले मुहल्ले में इन दिनों अजीब-ओ-गरीब हलचल है। देखते ही देखते दो समानांतर वर्गों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर सत्ता की कठपुतली की तरह काम करने के आरोप मढ़ रहे हैं। कोई किसी पर इगो हावी होने दावा कर रहा है तो कोई अपनी शान में गुस्ताखी के किस्से सुना रहा है। अपने-अपने खेमे के लोगों के साथ हो रहे भेदभाव का जिक्र कर सहानुभूति बटोरने की जोर-जुगत लगाई जा रही है। क्या है नया मामला, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से…।

by Dr. Brajesh Mishra
Jharkhand Bureaucracy
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Jharkhand Bureaucracy :  कमरे से संगीत की मंद-मंद ध्वनि आ रही थी। पंक्तियां साहिर लुधियानवी की थीं- ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया, ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया, ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…। गुरु कहीं निकलने की तैयारी में थे। एक तरफ बैग रखा था। दूसरी तरफ टेबल पर अखबार और चाय की प्याली पड़ी थी। गुरु जूते में पैर फिट करने की मशक्कत कर रहे थे। अभिवादन करते हुए पास पहुंचा। गुरु ने आशीर्वाद देते हुए पूछा, ‘तुम तो दिल्ली जाने वाले थे?’ दरअसल, गुरु का प्रश्न उनसे पूर्व में हुई वार्ता से जुड़ा था।

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लिहाजा बिना कोई देर किए भाव समझ गया। कहा- नहीं गुरु कार्यक्रम टल गया, ‘शायद आप कहीं जा रहे हैं।’ यात्रा से पहले यूं टोका जाना गुरु को नागवार गुजरा। बोले- हां, जाना तो था, लेकिन अब कुछ देर बाद रवाना होंगे। गुरु की बात को सुनकर आत्मिक शांति मिली। सोचने लगा कि अब आना बेकार नहीं होगा। कुछ काम की बात निकल ही जाएगी। गुरु ने एक हाथ में चाय की प्याली पकड़ी, दूसरे से अखबार। सरसरी तौर पर खबरों को देखा और फिर पेपर टेबल पर रख दिया। सेवादार ने पानी का गिलास और चाय की दूसरी प्याली सामने रखी। इधर गुरु ने प्रासंगिक संवाद शुरू कर दिया। बोले- जानते हो? वनांचल की नौकरशाही में आईपीएल से ज्यादा रोमांचक मुकाबले शुरू हो गए हैं।

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पूछा- वो कौन सा? गुरु बोले- ‘आईए बनाम आईपी’। गुरु के कूटनीतिक शब्द समझ में आ रहे थे, लेकिन अभी अनजान बने रहने में ही समझदारी थी। पूछा, ‘हां, वो तो पता है, कुछ नया हुआ है क्या?’ गुरु बोले- अरे नायडू के ‘पीआर’ प्रकरण से अब तक अनजान हो? जवाब दिया, ‘हां गुरु, बिल्कुल, दूर-दूर तक इस बारे में कोई खबर नहीं है।’ गुरु बोले- तो सुनो, आईपी टीम के बड़े खिलाड़ी नायडू ने एक के बाद एक तीन मैदानों पर धुआंधार बैटिंग कर डाली। खेल खत्म होने के बाद पवेलियन लौटे। फिर खुद को मंजा हुआ खिलाड़ी मान सुसज्जित कक्ष में अपना कब्जा जमा लिया। इंतजार पर इंतजार होता रहा, लेकिन नायडू को नहीं निकलना था सो नहीं निकले। थक-हारकर कमरे का मेनटेनेंस देखने वालों ने कागजी कार्रवाई शुरू कर दी। अब नायडू को यह बात नागवार गुजरी। लिहाजा, टीम के दूसरे खिलाड़ियों से अपनी पीड़ा बताई।

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दावा किया कि विपक्षी टीम के मुख्य कोच कुमार व्यक्तिगत रंजिश पाल रहे‌। मेरे रुतबे का ‘विनाश’ करने पर तुले हैं। कमरा खाली कराने की साजिश में शामिल हैं। उनकी पीड़ा सुनाने का असर पड़ा। बात स्वाभिमान पर आ गई। टीम के खिलाड़ियों ने एकजुटता दिखाई। विपक्षी खेमे पर दबाव बनाया गया कि वह नायडू के सम्मान में कुछ मोहलत दें। बहरहाल, अब बात मोहलत और मर्यादा पर आकर टिक गई है। खेल को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि दोनों टीमों के बीच विश्वास की खाई लगातार बढ़ रही है।

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हाल में दारू वाले खेल सहित कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए, जिसने हालात को और जटिल बना दिया है। यही कारण है कि कभी साथ-साथ चलने वाले खिलाड़ी अब एक-दूसरे को शक की निगाह से ‌देख रहे हैं। परिवर्तन का दौर है। क्या पता, कोई फंसे तो हमराज ही राज को उगलने लग जाए। गुरु की बात पूरी हो गई थी। सो, अपनी कुर्सी से उठा, यात्रा की शुभकामना दी और अपने रास्ते निकल लिया। यह सोचते हुए कि सब एक ही दौड़ में शामिल हैं। यह जानते हुए भी कि यह जग माया और पालनहार ‘अविनाशी’ है।

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