दुमका : झारखंड की उपराजधानी दुमका शहर से सटे हिजला पहाड़ी की तलहटी में हिजला बस्ती। दुमका सदर प्रखंड की सरुवा पंचायत का एक गांव और शहर से महज चार किलोमीटर दूर। इसी बस्ती में मयूराक्षी नदी तट व हिजला पहाड़ी है। तकरीबन 13 साल पुराना ऐतिहासिक राजकीय जनजातीय हिजला मेला परिसर। समय के साथ हिजला मेला परिसर की काया थोड़ी बदली है। मेला परिसर के चारों ओर आधारभूत संरचनाओं का निर्माण कराया गया है।
इस वर्ष 13 फरवरी से प्रारंभ हो रहे ऐतिहासिक राजकीय जनजातीय हिजला मेला की प्रशासनिक तैयारियां तेजी से चल रही है। खास कर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी कृषि विभाग की प्रदर्शनी के लिए तेजी से स्थल को तैयार किया जा रहा है। लक्ष्य है कि किसी भी सूरत में मेला प्रारंभ होने से पूर्व तमाम तैयारियां पूरी करा ली जाए। साढ़े चार वर्ष पूर्व भवन निर्माण निगम की ओर से मेला परिसर में तकरीबन छह करोड़ रुपये की लागत से कई परियोजनाओं को धरातल पर उतारने की पहल हुई है।
ढांचागत निर्माण से बदल गया लुक
हिजला मेला परिसर के बीच में स्थित है चांद-भैरव मुर्मू कला मंच। इस मंच की उपयोगिता हिजला मेला के दौरान सांस्कृतिक आयोजनों के लिए होती है। खेलकूद प्रतियोगिता के दौरान यह मंच अतिथियों के लिए किया जाता है। इस मंच का उपयोग मेला में अव्वल प्रतिभागियों को पुरस्कृत करने के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम, विभिन्न स्तर की प्रतियोगिताएं व संबोधन के लिए किया जाता है। हिजला मेला संपन्न होने के बाद भी सालों भर हिजला के आसपास के ग्रामीण इसका उपयोग किसी न किसी रूप में करते हैं। इस मंच का आकार 75 फीट गुणा 25 फीट है।
मेला परिसर के एक हिस्से में प्रशासनिक ब्लाक का निर्माण कराया गया है। प्रशासनिक भवन का आकार शंखनुमा है। मेला परिसर के बीचों-बीच स्थित जाहेरथान को दर्शनीय बना दिया गया है। यहां रोशनी की पुख्ता व्यवस्था और सुरक्षा के मद्देनजर गेट भी लग चुका है। मेला परिसर को नया लुक देने के लिए यहां एक नया फूड कोर्ट भी बनवाया गया है। दो नए गेट का भी निर्माण कराया गया है। भवन निर्माण निगम इसे अब हैंड ओवर करने की तैयारी में है। मेला परिसर में एक पुरुष व एक महिला शौचालय का निर्माण कार्य हुआ है।
आधारभूत संरचनाओं के जरिए बढ़ रही सुविधा
हिजला मेला परिसर का मुख्य द्वार समेत फूलो-झानो कला मंच, मैदान परिसर और सामुदायिक भवन का भी कायाकल्प करने के साथ कई सुविधाएं भी बढ़ाने की पहल हुई है। पर्याप्त रोशनी के लिए हाइमास्ट लाइट, स्ट्रीट लाइट लगाया गया है। भवन निर्माण निगम के मुताबिक मेला क्षेत्र में चार हाइमास्ट लगाया गया है। स्थायी तौर पर साउंड सिस्टम और किचन सामग्री की व्यवस्था भी 10 फरवरी तक बहाल होगी।
सामाजिक,आर्थिक व सांस्कृतिक पहचान है मेला
संताल परगना के गौरवपूर्ण सांस्कृतिक इतिहास में हिजला मेला की अपनी अलग पहचान है। क्षेत्रीय कला, रास, हर्ष, नृत्य और संगीत व सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। हिजला मेला की शुरुआत 136 साल पूर्व 3 फरवरी 1890 को ब्रिटिश हुकूमत के तत्कालीन उपायुक्त जान आर कास्टेयर्स ने की थी। तब से मेला इस क्षेत्र की संस्कृति को कला, रास-रंग और संगीत के माध्यम से प्रदर्शित करने की परंपरा चली आ रही है। मेला का शुभारंभ किए जाने के बाद क्षेत्र के ग्राम प्रधान, मांझी, परगनैत के साथ ब्रिटिश हुक्मरान बैठकर विचार-विमर्श करते थे। इस कारण यहां बनने वाली नियमावली को अंग्रेजी में हिज ला कहा गया और धीरे-धीरे यह हिजला के नाम से पुकारा जाने लगा।
हिजला मेला परिसर के उन्नयन का कार्य टेंडर के माध्यम से पांच करोड़ 81,29371 रुपये की लागत से कराया गया है। राशि कल्याण विभाग से उपलब्ध कराया गया है और कार्य भवन निर्माण निगम के जरिए हो रहा है। तमाम आधारभूत संरचना बनकर तैयार है और इसे 10 फरवरी तक अनुमंडल पदाधिकारी को हैंड ओवर करने की तैयारी है।
-राजू कुमार, कार्यपालक अभियंता, भवन निर्माण निगम
राजकीय जनजातीय हिजला मेला का इतिहास काफी दिलचस्प है। इस मेला से सामाजिक,आर्थिक व सांस्कृतिक पहचान जुड़ी है। झारखंड ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल,ओड़िशा समेत कई प्रदेशों से इस मेला का जुड़ा वर्षाें से कायम है। मेला परिसर की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए कई अभिनव प्रयोग किए जाएंगे ताकि यहां आने वाले ग्रामीण व शहरी लोगों को बदलाव का एहसास हो सके। साथ ही मेला की गरिमा व अक्षुण्णता को भी बरकरार रखा जाएगा।
–अभिजीत सिन्हा, उपायुक्त
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