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Tanginath Dham: क्या है टांगीनाथधाम का इतिहास, जानिए भगवान परशुराम, रहस्यमयी त्रिशूल और पौराणिक धरोहर से जुड़ी पूरी कहानी

झारखंड के गुमला स्थित टांगीनाथ धाम का रहस्यमयी इतिहास, जहां भगवान परशुराम की तपस्या, विशाल त्रिशूल का रहस्य, प्राचीन मंदिर और आस्था, इतिहास व प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

by Rakesh Pandey
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रांची : झारखंड की धरती अपने भीतर अनेक रहस्य, पौराणिक कथाएं और प्राचीन धरोहर समेटे हुए है। इन्हीं में से एक है टांगीनाथधाम, जिसे राज्य के सबसे रहस्यमयी और आस्था से जुड़े धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। भगवान शिव और भगवान परशुराम से जुड़ा यह प्राचीन धाम वर्षों से श्रद्धालुओं, इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

गुमला जिले के डुमरी प्रखंड स्थित यह धाम केवल धार्मिक स्थल भर नहीं है, बल्कि यह पौराणिक मान्यताओं, रहस्यमयी घटनाओं, प्राचीन स्थापत्य कला और लोकविश्वासों का अनोखा संगम भी है। यहां मौजूद विशाल त्रिशूल, सैकड़ों शिवलिंग, देवी-देवताओं की दुर्लभ प्रतिमाएं और खंडहरनुमा मंदिर परिसर आज भी कई अनसुलझे सवाल खड़े करते हैं।

परशुराम जयंती और सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से लोग भगवान शिव और भगवान परशुराम के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह धाम धार्मिक पर्यटन के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

भगवान परशुराम से जुड़ी है टांगीनाथधाम की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में जनकपुर में माता सीता के स्वयंवर के दौरान भगवान श्रीराम ने भगवान शिव का धनुष तोड़ दिया था। इस घटना से भगवान परशुराम अत्यंत क्रोधित हो गए थे। कहा जाता है कि स्वयंवर सभा में लक्ष्मण और परशुराम के बीच तीखी बहस भी हुई थी।

बाद में भगवान परशुराम को यह ज्ञात हुआ कि भगवान श्रीराम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। इसके बाद उन्हें अपने व्यवहार पर आत्मग्लानि हुई। मान्यता है कि पश्चाताप करने के लिए भगवान परशुराम वन और पर्वतीय क्षेत्रों की ओर निकल पड़े।

इसी क्रम में वे वर्तमान झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे पर्वतीय इलाके में पहुंचे। गुमला जिले के मझगांव क्षेत्र में उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या और आराधना की। कहा जाता है कि तपस्या के दौरान उन्होंने अपना परशु यानी फरसा भूमि में गाड़ दिया था।

स्थानीय झारखंडी बोली में फरसा को “टांगी” कहा जाता है। इसी कारण इस स्थान का नाम “टांगीनाथ” पड़ा और बाद में यह स्थान टांगीनाथधाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां भगवान परशुराम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए थे। इसी वजह से यह स्थल भगवान शिव और भगवान परशुराम दोनों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

रहस्यमयी त्रिशूल आज भी बना हुआ है आकर्षण का केंद्र

टांगीनाथधाम का सबसे बड़ा आकर्षण यहां स्थित विशाल त्रिशूल है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के अनुसार यह त्रिशूल जमीन में लगभग सत्रह फीट तक धंसा हुआ है। वर्षों से खुले आसमान के नीचे रहने के बावजूद इस त्रिशूल में कभी जंग नहीं लगने की बात लोगों को सबसे अधिक आश्चर्यचकित करती है।

मान्यता है कि यह त्रिशूल साधारण धातु से निर्मित नहीं है। कई लोग इसे दिव्य शक्ति का प्रतीक मानते हैं। हालांकि वैज्ञानिक स्तर पर इसके धात्विक स्वरूप को लेकर कोई ठोस अध्ययन सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ पाया है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव शनिदेव के किसी अपराध से क्रोधित हो गए थे। क्रोध में उन्होंने अपना त्रिशूल फेंका, जो आकर मझगांव की पहाड़ी पर धंस गया। यही त्रिशूल आज टांगीनाथधाम में श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।

स्थानीय लोगों के अनुसार इस त्रिशूल को हटाने या काटने का प्रयास कई बार किया गया, लेकिन कोई भी इसमें सफल नहीं हो सका। यही कारण है कि यह त्रिशूल रहस्य और आस्था दोनों का प्रतीक बन चुका है।

सैकड़ों शिवलिंग और प्राचीन प्रतिमाओं का अनोखा संसार

टांगीनाथधाम परिसर में सैकड़ों की संख्या में शिवलिंग और देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं मौजूद हैं। यहां भगवान शिव, माता दुर्गा, महिषासुर मर्दिनी, भगवान विष्णु, भगवान गणेश, सूर्यदेव, हनुमान और देवी लक्ष्मी की दुर्लभ मूर्तियां देखने को मिलती हैं।

इन प्रतिमाओं की सबसे खास बात उनकी नक्काशी और शिल्पकला है। पत्थरों पर की गई बारीक कलाकारी यह दर्शाती है कि किसी समय यह क्षेत्र समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार यहां की स्थापत्य शैली और मूर्तिकला में ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित प्राचीन मंदिरों की झलक दिखाई देती है। कई इतिहासकार मानते हैं कि यह स्थल मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है।

हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस मंदिर का निर्माण किस काल में हुआ था। इस कारण टांगीनाथधाम का इतिहास आज भी रहस्य बना हुआ है।

वर्ष 1989 दाई में मिले थे बहुमूल्य आभूषण

टांगीनाथधाम का महत्व तब और बढ़ गया जब वर्ष 1989 में यहां पुरातात्विक खुदाई कराई गई। खुदाई के दौरान यहां से सोने-चांदी के आभूषण, हीरे जड़ा मुकुट, प्राचीन सिक्के और कई बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुई थीं।

बताया जाता है कि खुदाई में मिले कई सामान आज भी डुमरी थाना के मालखाने में सुरक्षित रखे गए हैं। इन वस्तुओं ने यह संकेत दिया कि किसी समय यह स्थल अत्यंत समृद्ध धार्मिक केंद्र रहा होगा।

हालांकि कुछ कारणों से बाद में खुदाई का कार्य रोक दिया गया और फिर बड़े स्तर पर अध्ययन नहीं हो सका। यही वजह है कि टांगीनाथधाम से जुड़े अनेक रहस्य आज भी अनसुलझे हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि यदि यहां व्यापक स्तर पर वैज्ञानिक अध्ययन और खुदाई कराई जाए, तो झारखंड के प्राचीन इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

विश्वकर्मा द्वारा निर्माण की भी है मान्यता

स्थानीय लोगों के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि टांगीनाथधाम का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था। कहा जाता है कि यहां मौजूद विशाल संरचनाएं और पत्थरों की कलाकृतियां सामान्य मानव निर्माण से कहीं अधिक अद्भुत प्रतीत होती हैं।

हालांकि वर्तमान समय में मंदिर परिसर काफी हद तक खंडहर में बदल चुका है, लेकिन यहां की स्थापत्य शैली आज भी लोगों को आकर्षित करती है। टूटे हुए मंदिर, बिखरे पत्थर और प्राचीन मूर्तियां इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी सुनाते हैं।

लोहरा समुदाय से जुड़ी रहस्यमयी मान्यता

टांगीनाथधाम से जुड़ी एक लोककथा आज भी स्थानीय लोगों के बीच चर्चित है। कहा जाता है कि वर्षों पहले कुछ लोगों ने यहां मौजूद त्रिशूल को काटने का प्रयास किया था। वे लोग लोहरा समुदाय से जुड़े बताए जाते हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार इसके बाद उस समुदाय के लोगों का इस इलाके में निवास समाप्त हो गया। ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि कोई यहां बसने की कोशिश करता है, तो उसे अनिष्ट का सामना करना पड़ता है।

प्राकृतिक सुंदरता और आस्था का अद्भुत संगम

टांगीनाथधाम केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी लोगों को आकर्षित करता है। यह धाम झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा के निकट पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। आसपास घने सखुआ जंगल, शांत वातावरण और नेतरहाट की तराई इसकी सुंदरता को और बढ़ा देते हैं।

बरसात और सावन के मौसम में यहां का दृश्य अत्यंत मनमोहक हो जाता है। यही कारण है कि श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमी और पर्यटक भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं।

टांगीनाथधाम आज भी आस्था, इतिहास, रहस्य और प्रकृति का अद्भुत संगम बना हुआ है। यहां मौजूद रहस्यमयी त्रिशूल, प्राचीन मूर्तियां और पौराणिक कथाएं इसे झारखंड के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में विशेष पहचान दिलाती हैं।

FAQ (Frequently Asked Questions)

Q1. टांगीनाथ धाम कहां स्थित है?

टांगीनाथ धाम झारखंड के गुमला जिले के डुमरी प्रखंड में स्थित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जो अपनी रहस्यमयी और पौराणिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है।

Q2. टांगीनाथ धाम किस भगवान से जुड़ा है?

यह धाम मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवान परशुराम से जुड़ा हुआ है और दोनों की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

Q3. टांगीनाथ नाम कैसे पड़ा?

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम ने यहां अपना फरसा गाड़ा था, जिसे स्थानीय भाषा में “टांगी” कहा जाता है। इसी कारण इस स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा।

Q4. टांगीनाथ धाम का त्रिशूल क्यों प्रसिद्ध है?

यहां स्थित विशाल त्रिशूल जमीन में लगभग 17 फीट तक धंसा हुआ बताया जाता है और वर्षों से जंग न लगने के कारण इसे रहस्यमयी माना जाता है।

Q5. क्या टांगीनाथ धाम में खुदाई हुई है?

हाँ, वर्ष 1989 में यहां खुदाई के दौरान सोने-चांदी के आभूषण, प्राचीन सिक्के और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं मिली थीं।

Q6. टांगीनाथ धाम में कौन-कौन सी मूर्तियां हैं?

यहां भगवान शिव, विष्णु, गणेश, सूर्यदेव, दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन और दुर्लभ मूर्तियां मौजूद हैं।

Q7. टांगीनाथ धाम कब जाना सबसे अच्छा रहता है?

सावन माह और परशुराम जयंती के दौरान यहां श्रद्धालुओं की सबसे अधिक भीड़ होती है, इसलिए यह समय दर्शन के लिए विशेष माना जाता है।

Q8. क्या टांगीनाथ धाम एक पर्यटन स्थल भी है?

हाँ, धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है।

Q9. क्या टांगीनाथ धाम का इतिहास पूरी तरह स्पष्ट है?

नहीं, इस धाम का सटीक ऐतिहासिक काल और निर्माण समय अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, जिससे यह आज भी रहस्य बना हुआ है।

Q10. टांगीनाथ धाम क्यों खास है?

यह स्थल पौराणिक कथाओं, रहस्यमयी त्रिशूल, प्राचीन मंदिर संरचनाओं और प्राकृतिक सुंदरता के अद्भुत संगम के कारण विशेष महत्व रखता है।

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