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Jharkhand Bureaucracy :  नौकरशाही : झरोखे पर झांप

Jharkhand Bureaucracy : वनांचल में एक हाकिम के साथ कुछ ऐसा हो गया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। काफी जतन से अपने लिए ऐसा ठिकाना तय कराया था, जिससे जिंदगी में कुछ हरियाली आए। काम बन भी गया था, लेकिन ऐन वक्त पर कालचक्र ने धोखा दे दिया। अब हाकिम बौखलाए घूम रहे हैं। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracy :  न दिनों एक साहब बड़े बेचैन हैं। कभी हसरतें उफान मारती थीं, अब हाशिए पर पहुंच चुकी हैं। सारे अरमान टूट कर बिखर गए हैं। कहां तो यह उम्मीद थी, कुछ भला होगा। कुछ बड़ा होगा। पर, किसे पता था, सिर मुड़ाते ही ओले पड़ेंगे। सब कुछ एक सपने की तरह टूट गया। गर्मी के मौसम में जिस झरोखे से ठंडी हवा आने के इंतजार में टकटकी लगी थी, अचानक उस पर झांप गिर गया। गुरु की कथा निर्बाध चल रही थी। कथा के मुख्य पात्र के नाम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई थी। गुरु के सामने सीधा प्रश्न रखा।

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कौन हैं यह जनाब? गुरु थोड़ी देर मौन रहे। चाय की प्याली आहिस्ता से नीचे रखी। कहा- महोदय, पहले लाल आतंक वाले जनपद के मुखिया थे। व्यवस्था परिवर्तन में गुपचुप तरीके से स्थान परिवर्तन का योग बन गया। अभ्रक नगर नया ठिकाना बना। आनन-फानन में हवाई सफर पर भार उठा लिया। लगा अब दिन बदलने वाले हैं। माहौल में हरियाली होगी। लेकिन यह क्या? हुआ ठीक उल्टा। कुर्सी संभालते ही सब कुछ हवा हो गया। छानबीन करने पर पता चला, पुराने सूरमा ने अनुपस्थिति का भरपूर लाभ उठाया। गोपनीय में बैठकर गुप्त तरीके से सब गुपचुप कर डाला। सुना है, इन दिनों हुजूर के पास करने को कुछ खास नहीं है। लिहाजा स्वभाव के विपरीत खखुआए हुए घूम रहे हैं।

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बात-बात पर त्योरी चढ़ रही है। कहीं का गुस्सा, कहीं और निकल रहा है। अधीनस्थ मूड देखकर माजरा बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। गुरु को थोड़ा कुरेदा। कहा- गुरु, ‘हर कोई अपने लिए कुछ बेहतर सोचता है, आखिर कुछ लोग इसमें बाधक क्यों बन जाते हैं?’ गुरु बोले- ईर्ष्या का अंश मानव स्वभाव का मूल तत्व है। कोई दूसरे के लिए कुछ नहीं छोड़ना चाहता। जब जिसके हाथ में लाठी रही, भैंस उसी की। पुरखों ने यह कहावत यूं ही नहीं बनाई होगी। इसके पीछे लंबा अनुभव रहा होगा।

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यह दुनिया ऐसी ही है। कुछ लोग रेस में आगे रहने की जोर-जुगत में रहते हैं, तो कुछ दूसरों की टांग खींचने में। कई लोग इस ताक में रहते हैं कि कब, किसकी कमजोर नस दबाई जाए और वह कांय-कांय कर उठे। ऐसे लोगों के लिए यह मानसिक सुख और सुकून पाने का अवसर होता है। बहरहाल, इस मामले में बस इतना समझ लो कि अभ्रक की चमक साहब की किस्मत तक नहीं पहुंच रही। मौजूदा संसार में सारी सफलता-असफलता को लाभ से जोड़कर ही देखा जाता है। गुरु की बातों ने विराम लिया। काम पूरा हो चुका था। हमने भी हाथ जोड़े और निकल पड़े अपने रास्ते।

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