
रांची : झारखंड की आदिवासी संस्कृति और लोक परंपराओं में करम पर्व का विशेष स्थान है। इस वर्ष करम पूजा 22 सितंबर, मंगलवार को मनाई जा रही है। भादो मास की एकादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति के प्रति आस्था, कृषि जीवन, सामुदायिक एकजुटता और भाई-बहन के स्नेह से जुड़ा है। झारखंड के अलावा छत्तीसगढ़ और देश के कई अन्य हिस्सों में भी करमा देवता की पूजा श्रद्धा के साथ की जाती है।
करम पर्व के दौरान करम वृक्ष की पूजा की जाती है। आदिवासी समाज में करम वृक्ष को हरियाली, जीवन, उर्वरता और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पर्व से जुड़ी परंपराओं में प्रकृति और कृषि का गहरा संबंध दिखाई देता है। गांवों में करम गीत, पारंपरिक नृत्य और सामूहिक पूजा के आयोजन इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करते हैं।
करम पूजा 2026 कब मनाई जाएगी?
करम पूजा 2026 में आज मनाई जाएगी। यह पर्व भादो मास की एकादशी तिथि से जुड़ा हुआ है। करमा पर्व की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। विशेष रूप से युवतियां पूजा की तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पूजा से पहले अनाज के बीज बोने और उनकी देखभाल करने की परंपरा इस पर्व को कृषि जीवन से जोड़ती है।
करम पर्व केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं रहता। इसके पहले से ही गांवों में इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। युवतियां पारंपरिक विधि से जावा तैयार करती हैं और कई दिनों तक उसकी देखभाल करती हैं।
करम पूजा से पहले कैसे तैयार किया जाता है जावा?
करम पूजा से करीब सात दिन पहले करमयतीन यानी करम पूजा करने वाली युवतियां जावा उठाने की परंपरा शुरू करती हैं। इसके लिए सुबह नदी, तालाब या किसी अन्य जलस्रोत पर जाकर स्नान करने के बाद नई बांस की टोकरी या डलिया में बालू लाई जाती है। इसके बाद इसमें विभिन्न अनाजों के बीज बोए जाते हैं।
जावा में गेहूं, मकई, जौ, चना और धान सहित कई अनाजों के बीज डाले जाते हैं। बीज बोने के बाद डलिया को घर में सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। अगले सात दिनों तक इसकी नियमित देखभाल की जाती है। इसमें पानी देने और पूजा करने की परंपरा होती है। कई स्थानों पर जावा को धूप दिखाने की रस्म भी निभाई जाती है।
जावा तैयार करने की यह परंपरा कृषि और प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज की आस्था को दर्शाती है। बीजों के अंकुरित होने की प्रक्रिया को जीवन, हरियाली और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
करम पर्व में करम वृक्ष की पूजा का महत्व
करम पर्व की मुख्य पूजा में करम वृक्ष की डाल या करम शाखा का विशेष महत्व होता है। इसे विधि-विधान के साथ स्थापित कर पूजा की जाती है। करम वृक्ष को प्रकृति, जीवन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पर्व की परंपराएं जंगल, पेड़-पौधों, खेती और प्राकृतिक संसाधनों के साथ आदिवासी समाज के पारंपरिक संबंध को दर्शाती हैं।
करम पूजा के दौरान महिलाएं और युवतियां विशेष रूप से पूजा-अर्चना करती हैं। कई क्षेत्रों में परिवार और समुदाय के लोग सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होते हैं। पूजा के बाद करम गीत और पारंपरिक नृत्य का आयोजन किया जाता है।
करम पर्व में भाई-बहन के रिश्ते का महत्व
करम पर्व को भाई-बहन के स्नेह और पारिवारिक रिश्तों से भी जोड़ा जाता है। बहनें करम देवता की पूजा करते हुए अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख, समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना करती हैं। इस वजह से कई क्षेत्रों में करमा पर्व को भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती का प्रतीक भी माना जाता है।
करम पूजा की लोक परंपराओं में परिवार के साथ-साथ पूरे समुदाय की भागीदारी दिखाई देती है। पूजा, गीत और नृत्य के माध्यम से लोग सामूहिक रूप से पर्व मनाते हैं। इससे सामाजिक एकजुटता और पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
करम गीत और नृत्य की रहती है विशेष पहचान
करम पर्व की सबसे प्रमुख सांस्कृतिक परंपराओं में करम गीत और करम नृत्य शामिल हैं। भादो मास के दौरान कई गांवों में करम गीतों की गूंज सुनाई देती है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ सामूहिक नृत्य और गीत इस पर्व के उत्सव को विशेष रूप देते हैं।
करम गीतों में प्रकृति, खेती, सामाजिक जीवन और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े भाव देखने को मिलते हैं। अलग-अलग आदिवासी समुदायों और क्षेत्रों में करम पर्व मनाने की विधि तथा गीत-नृत्य की परंपराओं में स्थानीय स्तर पर अंतर भी पाया जाता है।
झारखंड में करम पर्व पर होंगे सांस्कृतिक आयोजन
झारखंड में करम पर्व को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में तैयारियां की जाती हैं। राजधानी रांची सहित कई स्थानों पर सामूहिक करम पूजा, पारंपरिक गीत और करम नृत्य के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पर्व को लेकर विशेष उत्साह रहता है।
करम पर्व झारखंड की आदिवासी संस्कृति, लोक परंपरा और प्रकृति से जुड़े जीवन मूल्यों की महत्वपूर्ण पहचान है। इसमें धार्मिक आस्था के साथ कृषि, पर्यावरण, सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। यही वजह है कि करमा पर्व झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

