
रांची : झारखंड में गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदियों को समय से पहले जेल से बाहर आने की राहत नहीं मिली है। राज्य सरकार ने 53 सजायाफ्ता कैदियों की समयपूर्व रिहाई के प्रस्तावों को खारिज कर दिया है। इनमें वासेपुर का चर्चित गैंगस्टर फहीम खान, रांची का अनिल शर्मा और सुरेंद्र बंगाली उर्फ सुरेंद्र सिंह रोतेला जैसे नाम शामिल हैं। राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद ने 30 जुलाई 2026 की बैठक के बाद 53 कैदियों की रिहाई के प्रस्ताव खारिज किए गए हैं। गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की अधिसूचना में कई कैदियों की रिहाई के प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने के पीछे अपराध की गंभीरता, संबंधित अधिकारियों की प्रतिकूल रिपोर्ट और रिहाई के बाद कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जैसे कारणों का उल्लेख किया गया है।
परिषद के फैसले से स्पष्ट है कि समयपूर्व रिहाई के मामलों में केवल सजा काटने की अवधि या कैदी की उम्र को ही आधार नहीं बनाया गया। अपराध की प्रकृति, जेल में कैदी का आचरण, पुलिस की रिपोर्ट, जेल प्रशासन की राय और प्रोबेशन अधिकारी के आकलन जैसे पहलुओं पर भी विचार किया गया। जिन मामलों में रिहाई के बाद दोबारा अपराध होने, गैंगवार भड़कने या सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका जताई गई, उनमें कैदियों को राहत नहीं दी गई।
फहीम खान की रिहाई का प्रस्ताव क्यों हुआ खारिज?
धनबाद के वासेपुर निवासी फहीम खान का नाम झारखंड में अपराध और गैंगवार से जुड़े चर्चित मामलों में आता रहा है। झारखंड हाईकोर्ट के सात नवंबर 2025 के फैसले के अनुसार, सगीर हत्याकांड में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी।
राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद के समक्ष रखी गई रिपोर्ट में फहीम खान को स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाला गैंगस्टर बताया गया। अधिसूचना के अनुसार, पुलिस, जेल प्रशासन और प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट उनके पक्ष में नहीं थी। संबंधित रिपोर्टों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद परिषद ने उनकी समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को उचित नहीं माना।
फहीम खान का मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि वासेपुर में उनके नाम की पहचान लंबे समय से आपराधिक गतिविधियों से जुड़ी रही है। हालांकि, रिहाई पर रोक का आधार संबंधित मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और अधिकारियों की रिपोर्ट को बनाया गया है।
अनिल शर्मा के मामले में जेल के भीतर हत्या का जिक्र
समयपूर्व रिहाई के लिए जिन कैदियों के प्रस्ताव खारिज किए गए, उनमें अनिल शर्मा का मामला भी है। अधिसूचना के मुताबिक, अनिल शर्मा ने जेल के अंदर एक अन्य कैदी की हत्या की थी। इस घटना को उनकी रिहाई के प्रस्ताव पर विचार करते समय गंभीर आधार माना गया।
दस्तावेज में यह भी उल्लेख किया गया कि उनकी रिहाई से गैंगवार की स्थिति पैदा होने और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका है। इसके अलावा, उनके पहले न्यायिक हिरासत से फरार होने का भी जिक्र किया गया है। इन तथ्यों के साथ संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद परिषद ने उन्हें समयपूर्व रिहाई देने से इनकार कर दिया।
जेल के भीतर हत्या की घटना को गंभीर मानते हुए परिषद ने संभावित जोखिमों को भी निर्णय का हिस्सा बनाया। इस मामले में रिहाई के बाद कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को अहम माना गया।
सुरेंद्र बंगाली को फिरौती के लिए दोहरे हत्याकांड में राहत नहीं
सुरेंद्र बंगाली उर्फ सुरेंद्र सिंह रोतेला का नाम भी 53 कैदियों की सूची में शामिल है। करीब 68 वर्षीय सुरेंद्र बंगाली को फिरौती के लिए दो लोगों की हत्या के मामले में दोषी बताया गया है। परिषद ने अपराध की गंभीरता और संबंधित रिपोर्टों पर विचार करने के बाद उनकी समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
इस मामले में उम्र को रिहाई का पर्याप्त आधार नहीं माना गया। निर्णय में अपराध की प्रकृति और उपलब्ध रिपोर्टों को महत्व दिया गया। सुरेंद्र बंगाली का नाम झारखंड में हत्या के मामलों और सजा में छूट से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में पहले भी चर्चा में रहा है।
वर्ष 2019 में झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी क्षमादान याचिका पर राज्य सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया था। मौजूदा मामले में परिषद ने उपलब्ध तथ्यों और अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए समयपूर्व रिहाई का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
मौसी की हत्या के दोषी नवल साहू को भी नहीं मिली छूट
अधिसूचना में लोहरदगा के नवल साहू का मामला भी दर्ज है। दस्तावेज के अनुसार, नवल साहू को अपनी बड़ी मौसी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। परिषद ने मामले की प्रकृति और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद उन्हें समय से पहले रिहा करना उचित नहीं माना।
इस मामले में भी अपराध की गंभीरता को निर्णय का प्रमुख आधार बनाया गया। परिषद ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इससे स्पष्ट होता है कि गंभीर हत्या के मामलों में रिहाई पर विचार करते समय संबंधित अपराध की परिस्थितियों और अधिकारियों की रिपोर्ट को महत्व दिया गया।

