
रांची : झारखंड के सरकारी स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा देने की व्यवस्था अब भी कई चुनौतियों से जूझ रही है। राज्य में सरकारी स्कूलों में नामांकित कुल विद्यार्थियों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की हिस्सेदारी महज 0.67 प्रतिशत है। वहीं, ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों का अनुपात भी काफी कम है। स्कूलों में रैंप और दिव्यांग बच्चों के अनुकूल शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में भी अंतर दिखाई दे रहा है। इन स्थितियों पर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने राज्य के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग का ध्यान आकृष्ट कराया है और समावेशी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा है।
केंद्र ने स्पष्ट किया है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान कर उनका सामान्य स्कूलों में नामांकन सुनिश्चित करना जरूरी है। इसके साथ ही शिक्षकों के प्रशिक्षण, विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं और समावेशी शिक्षा कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप सभी बच्चों को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराने से जुड़ी है।
झारखंड में दिव्यांग बच्चों का नामांकन सिर्फ 0.67 प्रतिशत
समग्र शिक्षा अभियान के तहत विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ पढ़ाई का अवसर देने के लिए समावेशी शिक्षा कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना और उनकी जरूरतों के अनुरूप पढ़ाई की व्यवस्था उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद झारखंड के सरकारी स्कूलों में ऐसे बच्चों के नामांकन की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक बैठक के दौरान राज्य के अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठाया। बैठक की कार्यवाही राज्य सरकार को भेजते हुए मंत्रालय ने कुल नामांकन में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की हिस्सेदारी कम होने पर ध्यान देने को कहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में नामांकित विद्यार्थियों में इन बच्चों की हिस्सेदारी केवल 0.67 प्रतिशत है।
केंद्र ने राज्य से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान करने और उन्हें स्कूलों से जोड़ने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने का अनुरोध किया है। इसके लिए समावेशी शिक्षा कार्यक्रम के तहत चल रहे प्रयासों की समीक्षा करने और जहां कमियां हैं, वहां सुधार करने की जरूरत बताई गई है।
विशेष बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ 6.19 प्रतिशत शिक्षक प्रशिक्षित
दिव्यांग बच्चों को सामान्य कक्षाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की अहम भूमिका होती है। हालांकि, झारखंड में इस दिशा में भी सुधार की गुंजाइश सामने आई है। यूडायस प्लस 2024-25 के आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि राज्य में केवल 6.19 प्रतिशत शिक्षक ही विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित हैं।
इस स्थिति में दिव्यांग विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतों को समझने और उनके अनुरूप शिक्षण पद्धति अपनाने की चुनौती बनी रह सकती है। समावेशी शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षकों को आवश्यक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है, ताकि वे अलग-अलग जरूरतों वाले बच्चों को कक्षा में बेहतर तरीके से पढ़ा सकें।
राज्य में समावेशी शिक्षा कार्यक्रम के तहत 536 विशेष शिक्षक नियुक्त हैं। हालांकि, इनमें से कई शिक्षक प्रखंड संसाधन केंद्रों में कार्यरत हैं। ऐसे में विशेष शिक्षकों की उपलब्धता और उनकी सेवाओं का उपयोग स्कूलों में किस प्रकार किया जा रहा है, यह भी समावेशी शिक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण पहलू है।
प्रशस्त-2.0 ऐप से दिव्यांग बच्चों की पहचान पर जोर
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान के लिए प्रशस्त-2.0 ऐप शुरू किया है। मंत्रालय ने झारखंड सरकार से इस ऐप का उपयोग करने का अनुरोध किया है। इसका उद्देश्य विशेष जरूरत वाले बच्चों की पहचान की प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाने में सहायता करना है, ताकि उन्हें शिक्षा से जोड़ने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
विशेष आवश्यकता वाले कई बच्चों तक शिक्षा की सुविधाएं पहुंचाने के लिए उनकी जरूरतों की पहचान करना जरूरी है। समय पर पहचान होने से स्कूलों और शिक्षा विभाग को बच्चों के लिए उपयुक्त शैक्षणिक सहायता की व्यवस्था करने में मदद मिल सकती है।
केंद्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप राज्य की समावेशी शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने का आग्रह किया है। इसके तहत नामांकन बढ़ाने के साथ-साथ शिक्षकों के प्रशिक्षण और स्कूलों में आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
झारखंड के 44,367 स्कूलों में रैंप की स्थिति
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को स्कूलों तक पहुंचने और परिसर में आवाजाही करने में आसानी हो, इसके लिए रैंप जैसी सुविधाएं जरूरी हैं। राज्य में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुल 44,367 स्कूलों में से 67.21 प्रतिशत स्कूलों में रैंप की सुविधा मौजूद है।
इसका अर्थ है कि करीब एक तिहाई स्कूलों में रैंप की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे विद्यालयों में शारीरिक दिव्यांगता वाले बच्चों को परिसर में प्रवेश करने और अलग-अलग स्थानों तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। इसलिए विद्यालयों को अधिक सुलभ बनाने के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार महत्वपूर्ण है।
सिर्फ 6.07 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल शौचालय
स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड के केवल 3,132 स्कूलों में ऐसे शौचालय बनाए गए हैं, जो कुल स्कूलों का 6.07 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा बताता है कि विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों की जरूरतों के अनुरूप स्वच्छता सुविधाओं का विस्तार करने की आवश्यकता है। सुरक्षित और सुलभ शौचालय की व्यवस्था बच्चों की नियमित उपस्थिति, सुविधा और शिक्षा में उनकी भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है।
रैंप और शौचालय जैसी सुविधाओं की उपलब्धता में अंतर को देखते हुए स्कूलों के बुनियादी ढांचे की समीक्षा जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को केवल नामांकन तक सीमित न रहना पड़े, बल्कि वे नियमित रूप से स्कूल आकर पढ़ाई भी कर सकें।
समावेशी शिक्षा में सुधार के लिए केंद्र ने दिए निर्देश
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने झारखंड में समावेशी शिक्षा कार्यक्रम की स्थिति पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से आवश्यक सुधार करने का अनुरोध किया है। इसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान, सामान्य स्कूलों में उनका नामांकन, शिक्षकों का प्रशिक्षण और दिव्यांग बच्चों के अनुकूल सुविधाओं का विस्तार शामिल है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उद्देश्य सभी बच्चों को समान और सुलभ शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना है। वहीं, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 भी दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और शिक्षा तक उनकी पहुंच से संबंधित प्रावधान करता है।
झारखंड में नामांकन, शिक्षक प्रशिक्षण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि समावेशी शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए कई स्तरों पर काम करने की जरूरत है। अब राज्य सरकार के सामने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान बढ़ाने, उन्हें स्कूलों से जोड़ने और विद्यालयों को उनकी जरूरतों के अनुकूल बनाने की चुनौती है।

