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आधुनिक दिल्ली के प्राचीन मंदिर

by Rakesh Pandey
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संजय शेफर्ड

दिल्ली को लुटियंस की दिल्ली कहा जाता है, पर यह एक ऐतिहासिक शहर है। इसकी जड़ें इतनी जीवंत और प्राचीन हैं कि इसे देखकर पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ की याद आ जाती है। यह वर्तमान में देश की राजधानी भी है, जिसकी वजह से इसके बारे में हर कोई जानना और बात करना चाहता है। धर्म हो, संस्कृति हो अथवा पौराणिकता, यह शहर हर चीज़ को बहुत ही गहराई के साथ ख़ुद में समाए हुए है। लेकिन आज हम इन सबसे इतर इस लेख के माध्यम से यहाँ के प्राचीन मंदिरों के बारे में बताने वाले हैं। यह तो सभी जानते हैं कि दिल्ली में प्राचीनकाल से मंदिरों के निर्माण का एक बहुत ही समृद्ध इतिहास रहा है। इस नगर पर शासन करते हुए अनेक राजाओं ने अनेक मंदिर बनवाए, जिसमें से कुछ मंदिर आज भी मौजूद और जीवंत हैं। समय के साथ कितना कुछ बदला, पर यह मंदिर आज भी जैसे के तैसे लोगों की आस्था और विश्वास के आधार पर मज़बूती से खड़े दिखाई देते हैं।

योगमाया मंदिर में कन्या रूपी देवी

महरौली का योगमाया मंदिर कई कारणों से लोगों के बीच पॉप्युलर है, पर सबसे पहला कारण इस जगह को लेकर लोगों के मन में आस्था और विश्वास ही है। बताया जाता है कि बहुत सारे हिन्दू और जैन मंदिरों को तोड़कर क़ुतुबमीनार कॉम्प्लेक्स का निर्माण हुआ था। ऐसे में महरौली का योगमाया मंदिर इस जगह का इकलौता मंदिर है, जो बच पाया है। कुतुबमीनार के पिछले हिस्से में स्थित यह यह लघु मंदिर आज भी लोगों की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है। इस मंदिर में देवी को पिंडी के रूप में पूजा जाता है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि इसमें देवी माँ एक कन्या रूप में विराजमान हैं। वह कन्या, जिसने यशोदा माता की संतान के रूप में गोकुल में जन्म लिया था। तभी एक आकाशवाणी हुई और वासुदेव ने मथुरा के कारागृह में जन्मे नन्हें कृष्ण को उस लड़की की जगह पर सुला दिया था और उस कन्या को अपने साथ मथुरा लाये थे। कंस ने उसे मारने का प्रयास किया था और उसके हाथों से मुक्त हो कर वह कन्या विंध्याचल में देवी विंध्यवासिनी के रूप में स्थापित हो गयी थीं।

कालकाजी प्राचीनतम शक्ति पीठ

इसी तरह से कालकाजी मंदिर दिल्ली के सबसे लोकप्रिय और प्राचीनतम शक्ति मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के प्रति लोगों के मन में अगाध श्रद्धा और विश्वास है। यही कारण है कि इस जगह पर हर रोज़ हज़ारों लोग आते हैं। माता के दरबार में अपना शीश झुकाते हैं। यह जगह इतना पॉप्युलर हो चुका है कि इसके आसपास के क्षेत्र को भी इसी नाम से जाना जाता है और मेट्रो स्टेशन का नाम भी कालकाजी रखा गया है। यह मंदिर दक्षिणी दिल्ली में नेहरु प्लेस के पास एक पहाड़ी पर स्थित है। जिस पहाड़ी पर स्थित है, उस पहाड़ी को प्राचीन काल में सूर्यकूट कहा जाता था। इसी कारण से कालकाजी में विराजमान देवी को सूर्यकूट निवासिनी भी कहा जाता है। इस तथ्य को मंदिर में मौजूद 12 द्वार भी वर्णित करते हैं। मंदिर के 12 द्वार 12 आदित्यों एवं 12 राशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें वर्ष भर में सूर्य का प्रवास होता है। हमारे तमाम तरह के धार्मिक पुराणों में भी कालका देवी का उल्लेख किया गया है। दुर्गासप्तशती की कथा में इस बात का ज़िक्र है कि कालका देवी चंड-मुंड एवं रक्तबीज जैसे असुरों पर कैसे विजय प्राप्त करती हैं। यह छोटा सा मंदिर बहुत ही महात्म्य रखता है और इसके वर्तमान स्वरूप का निर्माण 18वीं सदी में मराठों ने करवाया था।

गुफा में विराजमान झंडेवाला देवी

झंडेवाला देवी मंदिर को लेकर लोगों में अगाध आस्था और विश्वास है। बताया जाता है कि इस आदिशक्ति के मंदिर की खोज बदरी भगत नामक एक भक्त ने की थी। देवी ने स्वयं उसके स्वप्न में आकर उसे अपने विग्रह के विषय में जानकारी दी थी। इस जगह से प्राप्त विग्रह में दोनों हाथ नहीं थे, बाद में उस विग्रह में चाँदी के हाथ जोड़े गए। आज भी वह मूर्ति मुख्य गुफा मंदिर में पूजी जाती है, जो मंदिर के निचले तल पर स्थित है। हालाँकि मुख्य मंदिर में इसी विग्रह मूर्ति का प्रतिरूप स्थापित किया गया है। मुख्य मूर्ति के एक ओर महाकाली तथा दूसरी ओर महासरस्वती की प्रतिमाएं हैं। इस मंदिर के समीप ही महालक्ष्मी, गणेश, अन्नपूर्णा, दुर्गा, शीतला माता एवं कामधेनु के छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंदिर के भीतर देवी की अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है। मंदिर के पृष्ठभाग में किंचित ऊँचे तल पर स्थित एक विशाल कक्ष में एक शिवलिंग स्थापित है। इस जगह पर आने से ऐसा माना जाता है कि इंसान को सुख और शांति की अनुभूति होती है और उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं।

नशा मुक्ति के लिए भैरो मंंदिर लोकप्रिय

पुराना किला के बाहरी हिस्से में स्थित भैरो मंदिर की भी काफ़ी मान्यता है। यह भैरो मंदिर महाभारत काल के दौरान का माना जाता है और हर दिन यहाँ पर भक्तों की भारी भीड़ रहती है। किवदंतियों के अनुसार भैरो जी की यह मूर्ति पांडू पुत्र भीम द्वारा यहाँ लाई गयी है, उन्होंने इस जगह पर तमाम सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। भैरव मंदिर में पूजा पद्धति का अपना एक अलग ही विधि और विधान है। यह एकमात्र मंदिर है, जहां भक्त अपने आराध्य को मदिरा चढ़ाते और प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस जगह पर अनेक लोग मदिरा की लत छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं और अंतिम मदिरा विग्रह को अर्पित करने आते हैं। अन्य दिनों के मुक़ाबले रविवार के दिन इस मंदिर में ज़्यादा भीड़ रहती है।

कटरा में मंदिरों का समूह

पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में स्थित कटरा नील नामक एक प्राचीन बस्ती है। इस क्षेत्र में कई प्राचीन शिवालय हैं, जिनमें अधिकाँश शिवालय हवेलियों के भीतर स्थित हैं। उन्हीं कुछ प्रमुख शिवालयों में धूमीमल शिवालय और घंटेश्वर महादेव का भी नाम आता है। इस बात को जानकार ताज्जुब होता है कि दिल्ली के छोटे से क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में छोटे-छोटे शिवालय अथवा प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति है। यह उपस्थिति कहीं न कहीं इस बात की ओर संकेत करती है कि इस्लाम काल में भी इस क्षेत्र में सशक्त हिन्दू वसाहत उपस्थित रही होगी।

800 वर्ष पुराना शिवलिंग

गौरी शंकर मंदिर को दिल्ली के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। बताया जाता है कि गौरी शंकर मंदिर में स्थित शिवलिंग 800 साल से भी प्राचीन है। यह मंदिर पुरानी दिल्ली इलाक़े में स्थित है और लाल क़िले से बहुत ही स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। एक कथा के अनुसार यह लिंग एक वृद्ध पीपल वृक्ष के समीप स्थित था जिसके निर्माण का स्वप्न मराठा योद्धा अप्पा गंगाधर राव ने देखा था। अप्पा गंगाधर राव ने प्रतिज्ञा की कि युद्ध में विजय प्राप्त करने पर वे यहाँ मंदिर का निर्माण करायेंगे। अंतत: वे युद्ध में विजयी हुए तथा उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया।

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