फीचर डेस्क : भारत की सनातन परंपरा में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व माना गया है। इन्हीं द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नौवां ज्योतिर्लिंग है बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग। इस जगह को बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। झारखंड के देवघर में स्थित यह पवित्र धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि इस ज्योतिर्लिंग को ‘कामना लिंग’ भी कहा जाता है।

श्रावण मास में यहां आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ता है, जिसे देखकर हर कोई भावविभोर हो उठता है। देशभर से लाखों कांवड़िए सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर करीब 105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा तय करते हुए बाबा धाम पहुंचते हैं और जलाभिषेक करते हैं। ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से पूरा देवघर शिवमय हो जाता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना के पीछे एक ऐसी कथा जुड़ी है, जिसमें रावण की घोर तपस्या, भगवान शिव का वरदान और भगवान विष्णु की अद्भुत लीला शामिल है? यही कथा इस धाम को और भी रहस्यमयी और दिव्य बनाती है।
जब रावण ने काट दिए अपने नौ सिर
पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंका के राजा रावण भगवान शिव का परम भक्त था। वह चाहता था कि भगवान शिव स्वयं लंका में निवास करें, ताकि उसकी नगरी सदैव अजेय बनी रहे। अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए रावण ने कठोर तपस्या शुरू की। वर्षों तक तप करने के बाद भी जब भगवान शिव प्रकट नहीं हुए, तो उसने अपने सिरों की आहुति देनी शुरू कर दी। एक-एक करके उसने अपने नौ सिर काटकर भगवान शिव को समर्पित कर दिए।
जब वह दसवां सिर काटने जा रहा था, तभी भगवान शिव उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उन्होंने रावण को जीवनदान दिया और उसके सभी कटे हुए सिर फिर से जोड़ दिए। रावण की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे अपना दिव्य आत्मलिंग प्रदान किया।

हालांकि, शिवजी ने एक शर्त भी रखी। उन्होंने कहा कि यह आत्मलिंग जिस स्थान पर एक बार धरती पर रख दिया जाएगा, वहीं स्थायी रूप से स्थापित हो जाएगा और फिर उसे कोई वहां से हटा नहीं सकेगा। रावण अत्यंत प्रसन्न होकर आत्मलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा।
देवताओं में मचा भय, फिर हुई विष्णुजी की लीला

देवताओं को जब यह पता चला कि रावण भगवान शिव को लंका ले जा रहा है, तो वे चिंतित हो उठे। उन्हें भय था कि यदि शिवलिंग लंका में स्थापित हो गया, तो रावण और भी अधिक शक्तिशाली हो जाएगा। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। उन्होंने वरुण देव को आदेश दिया कि वे रावण को लघुशंका के लिए विवश करें।
यात्रा के दौरान अचानक रावण को लघुशंका की तीव्र आवश्यकता महसूस हुई। लेकिन समस्या यह थी कि वह शिवलिंग को धरती पर नहीं रख सकता था। तभी उसे वहां एक ग्वाला दिखाई दिया। यह ग्वाला वास्तव में भगवान विष्णु का ही रूप था।
रावण ने उस ग्वाले से कुछ देर के लिए शिवलिंग पकड़ने की विनती की और स्वयं लघुशंका के लिए चला गया। काफी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद ग्वाले ने रावण को आवाज लगाई, लेकिन जब वह वापस नहीं आया, तो उसने शिवलिंग को धरती पर रख दिया। बस, यही वह क्षण था जिसने इतिहास बदल दिया।

लाख कोशिशों के बाद भी नहीं उठा पाया रावण
कुछ देर बाद जब रावण लौटा, तो उसने देखा कि शिवलिंग जमीन पर स्थापित हो चुका है। यह देखकर वह क्रोधित हो उठा। उसने पूरी शक्ति लगाकर शिवलिंग को उठाने की कोशिश की, लेकिन वह उसे हिला तक नहीं सका।
क्रोध में आकर रावण ने शिवलिंग को दबाने का प्रयास किया, जिससे उसका कुछ हिस्सा धरती में धंस गया। मान्यता है कि उसी स्थान पर भगवान शिव ‘बैद्यनाथ’ के रूप में स्थापित हो गए और तभी से यह स्थान महान तीर्थ बन गया। आज भी लाखों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के लिए देवघर पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं बाबा के चरणों में अर्पित करते हैं।
आखिर क्यों पड़ा ‘बैद्यनाथ’ नाम

‘बैद्यनाथ’ नाम के पीछे भी एक बेहद रोचक मान्यता है। कहा जाता है कि जब रावण ने अपने सिर काटकर भगवान शिव को अर्पित किए थे, तब भगवान शिव ने वैद्य यानी चिकित्सक के रूप में उसके घावों को ठीक किया था। उन्होंने रावण के कटे हुए सिरों को फिर से जोड़कर उसे स्वस्थ किया। भगवान शिव के इसी वैद्य स्वरूप के कारण इस स्थान का नाम ‘बैद्यनाथ’ पड़ा।
मान्यता है कि यहां श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर शारीरिक और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। यही वजह है कि बाबा बैद्यनाथधाम में रोगमुक्ति और सुख-समृद्धि की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दिखाई देती है।
श्रावणी मेले में उमड़ता है आस्था का सागर

बैद्यनाथधाम मंदिर का श्रावणी मेला विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता है। इस दौरान लाखों कांवरिए सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और बाबा पर जल अर्पित करते हैं।

मान्यता है कि श्रावण मास में बाबा बैद्यनाथ को गंगाजल चढ़ाने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि हर साल यहां श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ता है। बाबा बैद्यनाथधाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और शिवभक्ति का ऐसा दिव्य केंद्र है, जहां पहुंचकर हर भक्त को आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यही वजह है कि सदियों बाद भी बाबा धाम की महिमा करोड़ों श्रद्धालुओं के दिलों में अटूट बनी हुई है।
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FAQ (Frequently Asked Questions)
बाबा बैद्यनाथ धाम झारखंड के देवघर जिले में स्थित है। यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से नौवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है और देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाबा बैद्यनाथ के दरबार में सच्चे मन और श्रद्धा से पूजा-अर्चना करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को ‘कामना लिंग’ के नाम से भी जाना जाता है
पौराणिक कथा के अनुसार रावण भगवान शिव का आत्मलिंग लेकर लंका जा रहा था। भगवान विष्णु की लीला के कारण उसे शिवलिंग कुछ समय के लिए एक ग्वाले को सौंपना पड़ा। ग्वाले ने शिवलिंग को धरती पर रख दिया, जिसके बाद वह वहीं स्थापित हो गया। रावण लाख प्रयासों के बावजूद उसे दोबारा नहीं उठा सका और वही स्थान बाबा बैद्यनाथ धाम के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने नौ सिर काटकर अर्पित कर दिए थे। भगवान शिव ने वैद्य (चिकित्सक) के रूप में उसके घावों को ठीक किया और सिरों को पुनः जोड़ दिया। इसी कारण भगवान शिव यहां ‘बैद्यनाथ’ के नाम से पूजे जाते हैं।
श्रावणी मेले के दौरान लाखों कांवरिए बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि श्रावण मास में जल अर्पित करने से भगवान शिव भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाबा बैद्यनाथ धाम में श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर मानसिक शांति, सुख-समृद्धि, रोगों से मुक्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या दर्शन के लिए पहुंचती है।

