
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिलेभर में पखवाड़े भर से चल रहे पितृपक्ष का अनुष्ठान आज पूर्ण वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न हो गया। इस दौरान चाईबासा और चक्रधरपुर समेत पूरे क्षेत्र के तमाम जलस्रोतों, नदियों और तालाबों के घाटों पर सुबह से ही आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा।
स्थानीय निवासी शंभू देव गोपाल डे ने साझा किया कि वे अपने माता-पिता के परलोक सिधारने के बाद से हर वर्ष पितृपक्ष के इन पवित्र दिनों में प्रात:काल जलार्पण और वैदिक मंत्रों के जरिए पूजन करते आ रहे हैं, जो उनकी पीढ़ियों की परंपरा का हिस्सा है।
वहीं, पंडित संदीप परिमल गांगुली ने प्रकाश डाला कि पितृपक्ष के इन विशेष दिवसों पर चाईबासा की रोरो नदी समेत तमाम जलघाटों पर भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां लोग अपने दिवंगत बुजुर्गों व माता-पिता की मोक्ष प्राप्ति तथा आत्मिक शांति के लिए तर्पण व जलांजलि अर्पित करते हैं।
रोरो नदी के तट पर सूर्योदय से लेकर संध्याकाल तक अनुष्ठानों का क्रम अनवरत जारी रहा। श्रद्धालुओं ने अपने पुरखों से आशीष मांगते हुए घर-परिवार में अमन-चैन और समृद्धि की प्रार्थना की। दूसरी ओर, चक्रधरपुर में भी अंतिम दिन लोगों ने अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए विधि-सम्मत तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किया। बिंजय नदी के पुरानी सीढ़ी घाट, संजय नदी तट, थाना रोड स्थित घाटों के साथ-साथ विभिन्न तालाबों और घरों में भी स्नान-ध्यान कर पितरों के निमित्त तर्पण किया गया। पुरोहितों के सान्निध्य में कई लोगों ने पिंडदान संपन्न कर पूर्वजों की मुक्ति की कामना की।
इस समापन अवसर पर नदी तटों पर पूजा-पाठ के उपरांत ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया और गरीबों व जरूरतमंदों को दान दिया गया। सनातन संस्कृति में पितृपक्ष का अद्वितीय महत्व है; ऐसी गहरी मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितृगण संतुष्ट होकर कुटुंब को खुशहाली का वरदान देते हैं। इसी अटूट आस्था के साथ लोगों ने पितृपक्ष के अंतिम दिन अपने पूर्वजों को वंदन कर सनातन परंपरा का पूरी निष्ठा से निर्वहन किया।

