- बिहार चुनाव परिणामों के बाद तेज हो गई है सिहासी हल्के में चर्चा
- अक्टूबर में झामुमो ने चुनाव से अलग होने की घोषणा कर राजद-कांग्रेस पर लगाया था धूर्तता का आरोप
- झारखंड में ‘महागठबंधन’ की मजबूती पर उठने लगे थे सवाल
क्या मंईयां योजना को जारी रखने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन केंद्र के शरणागत हो जाएंगे? क्या टाटा से एडवांस राशि लेने की नौबत इसी आर्थिक दबाव का नतीजा है? यह वही हेमंत सोरेन हैं, जो ईडी और सीबीआई के दबाव के आगे कभी नहीं झुके, जेल जाना मंजूर कर लिया, लेकिन समझौते का रास्ता नहीं अपनाया। ऐसे में क्या झारखंड का खाली खजाना उन्हें महागठबंधन की गांठ ढीली कर एनडीए की ओर बढ़ने के लिए मजबूर कर सकता है? यह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि सियासी हलकों में चल रही गंभीर चर्चा है, जो बिहार चुनाव परिणामों के बाद और तेज हो गई है।
अक्टूबर में झामुमो ने बिहार चुनाव से अलग होने की घोषणा कर राजद और कांग्रेस पर धूर्तता व अपमान का आरोप लगाया था तथा गठबंधन की समीक्षा की बात कही थी। इसने झारखंड में ‘महागठबंधन’ की मजबूती पर सवाल खड़े किए। बिहार में राजद और कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद ये चर्चाएं और गहरी हुईं। उधर, राज्य की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए केंद्र की सहायता की आवश्यकता ने यह कयास और मजबूत कर दिया है कि आने वाले दिनों में राज्य की राजनीतिक स्थिति बदल भी सकती है।
मंईयां योजना बनी सियासी वरदान, आर्थिक बोझ भी
हेमंत सोरेन 2.0 सरकार के एक वर्ष पूरे हो गए हैं और मुख्यमंत्री के रूप में उनका छह साल का कार्यकाल (जेल के पांच महीनों को छोड़कर) भी पूरा हो चुका है। सत्ता में मजबूती, जनमत का समर्थन और विकास के दावों के बावजूद एक कड़वी सच्चाई यह है कि सरकार गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही है। मंईयां योजना, जिसने हेमंत सोरेन को ऐतिहासिक बहुमत दिलाया, आज वित्तीय रूप से सरकार की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। सरकार ने 2025-26 के बजट में इस योजना के लिए 13,363.35 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। योजना के तहत 18 से 50 साल की महिलाओं को प्रति माह 2500 रुपये यानी सालाना 30 हजार रुपये दिए जा रहे हैं, पर इसका सीधा प्रभाव अन्य योजनाओं पर पड़ा है।
स्कॉलरशिप रुकी, बच्चे फीस भरने में असमर्थ
राज्य के 6 लाख 63 हजार 499 विद्यार्थी, जो आदिवासी, दलित और अति पिछड़ा समुदाय से आते हैं, 2024-25 की ई-कल्याण प्री-मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप से वंचित हैं। कॉलेज फीस, किताबें और पढ़ाई की अन्य जरूरतें पूरी न कर पाने से इन छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। सरकार जिन वर्गों को अपना कोर वोटर और हितधारक बताती है, वे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इसी तरह बुजुर्गों, दिव्यांगों और विधवाओं की सामाजिक सुरक्षा पेंशन पर भी प्रभाव पड़ा है, क्योंकि केंद्र सरकार की ओर से राशि समय पर जारी नहीं हो पा रही।
क्या यह दबाव हेमंत सोरेन को एनडीए की ओर धकेल देगा?
यह सवाल अब राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। विकल्प असंभव नहीं माना जा रहा, क्योंकि झामुमो और भाजपा पहले भी गठबंधन कर सरकार चला चुके हैं। सत्ता की राजनीति में विचारधारा अक्सर पीछे छूट जाती है। देशभर में इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। नवीन पटनायक हों या नीतीश कुमार, दोनों ने केंद्र से बेहतर संबंध बनाकर विकास और अपनी राजनीतिक स्थिति दोनों को मजबूत रखा। इसी तरह आज झारखंड की राजनीति में हेमंत सोरेन भी अपरिहार्य स्थिति में हैं।
भाजपा नेताओं से जब पूछा जाता है कि क्या झामुमो-भाजपा साथ आ सकते हैं, तो वे सीधा इनकार नहीं करते और कहते हैं – ‘भाजपा अपने सहयोगियों को सम्मान देना जानती है।’ हाल में भाजपा के महामंत्री और राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा ने भी यही संकेत दिए थे।
दिल्ली दौरों ने बढ़ाई अटकलें
झारखंड सरकार के एक ताकतवर झामुमो कोटे के मंत्री पिछले दिनों लगातार दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं। वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के बाद सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनकी दिल्ली यात्राओं ने गठबंधन बदलने की अटकलों को और हवा दी है।
वास्तविक राजनीतिक हलचल या नैरेटिव वॉर?
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह वास्तविक राजनीतिक हलचल है या सिर्फ एक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हेमंत सोरेन सरकार को आर्थिक रूप से कमजोर करने की यह केंद्र की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। पिछले दो वर्षों में कोल रॉयल्टी, जीएसटी कंपनसेशन और पीएम आवास आदि मामलों में झारखंड के हिस्से में कटौती या देरी का पैटर्न देखा गया है। साथ ही, ईडी-सीबीआई की कार्रवाई लगातार जारी रही और खुद मुख्यमंत्री जेल जा चुके हैं। गैर-भाजपा सरकारों को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर करने का यह मॉडल दिल्ली, बंगाल और केरल में पहले इस्तेमाल हो चुका है।
मंईयां लिस्ट से 5.46 लाख महिलाओं के हटे नाम
मई 2025 में 5 लाख 46 हजार महिलाओं के नाम मंईयां योजना की सूची से हटाए गए। इससे परिवारों में असंतोष और विपक्ष के आरोप दोनों बढ़े। विपक्ष ने दावा किया कि लाभ सीमित लोगों तक पहुंच रहा है। सीएजी रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग में अनियमितताओं का खुलासा कर सरकार पर और दबाव बढ़ा दिया है।
फिलहाल हेमंत सोरेन मजबूत, लेकिन दबाव भारी
इन सबके बावजूद हेमंत सोरेन का आदिवासी-मूलवासी वोट बैंक अभी पूरी तरह एकजुट है। घाटशिला उपचुनाव में 38 हजार से अधिक मतों की रिकॉर्ड जीत इसका प्रमाण है। झामुमो अब संथाल परगना से बाहर अन्य आदिवासी इलाकों और ओबीसी वर्ग में भी मजबूत हो रहा है।
निकट भविष्य में समीकरण बदलेंगे?
फिलहाल स्थिति यह बताती है कि हेमंत सोरेन भाजपा से हाथ मिलाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या माना जाएगा। हां, राज्य सरकार 1 लाख 36 हजार करोड़ रुपये की बकाया राशि के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकती है, जैसा बंगाल और केरल कर रहे हैं। यदि 2025-26 में केंद्र से अपेक्षित राशि नहीं मिली, तो मइयां योजना और सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी योजनाओं में कटौती की नौबत आ सकती है और तब राजनीतिक नुकसान गंभीर हो सकता है।
फिलहाल स्थिति यह है कि राज्य सरकार के सामने नकद का संकट है। टाटा से अग्रिम राशि लेना इसी दबाव का संकेत है। हेमंत सोरेन अभी मजबूत हैं, लेकिन दबाव असाधारण है। आगे क्या होगा, यह समय तय करेगा।
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