
Jamshedpur : कोल्हान विश्वविद्यालय (केयू) और जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय (जेडब्ल्यूसी) में छात्रों की समस्याओं के निवारण के नाम पर बड़ा खेल सामने आया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सख्त निर्देशों के बावजूद दोनों विश्वविद्यालय बिना लोकपाल के ही संचालित हो रहे हैं। मजे की बात यह है कि यूजीसी द्वारा ‘डिफॉल्टर/ब्लैकलिस्ट’ होने से बचने के लिए दोनों संस्थानों ने लोकपाल की नियुक्ति की जानकारी तो भेज दी, लेकिन धरातल पर हकीकत यह है कि नियुक्त लोकपाल ने कभी कार्यभार (ज्वाइन) ही नहीं संभाला। नतीजा—आज भी दोनों विश्वविद्यालयों में लोकपाल का पद पूरी तरह रिक्त पड़ा है और छात्रों की शिकायतों का सर्वोच्च दरवाजा बंद है।
कागजी नियुक्ति से टला यूजीसी का डंडा
यूजीसी (विद्यार्थियों की शिकायतों का निवारण) विनियम के अनुसार, प्रत्येक विश्वविद्यालय में लोकपाल का पद अनिवार्य है। ऐसा न करने पर संबंधित संस्थान को यूजीसी ‘डिफॉल्टर सूची’ में डाल देता है, जिससे अनुदान और कई शैक्षणिक मान्यताओं पर खतरा मंडराता है। कार्रवाई से बचने के लिए वर्ष 2025 में राजभवन की ओर से कोल्हान विश्वविद्यालय और जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय के लिए संयुक्त रूप से एक लोकपाल की नियुक्ति की गई थी। विवि प्रशासन ने तुरंत इसकी सूचना यूजीसी को देकर खुद को ब्लैकलिस्ट श्रेणी से बाहर करा लिया। लेकिन जिस व्यक्ति की नियुक्ति हुई थी, उन्होंने व्यक्तिगत या तकनीकी कारणों से पदभार ग्रहण ही नहीं किया। महीनों बीत जाने के बाद भी विवि प्रशासन ने राजभवन या उच्च शिक्षा विभाग को वस्तुस्थिति से अवगत कराकर नई नियुक्ति की पहल नहीं की।
जून 2025 में हुई थी लोकपाल की नियुक्ति
कोल्हान विश्वविद्यालय और जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय के लोकपाल के रूप में नियुक्त प्रोफेसर टीआर थापक ने ढाई माह बाद भी पदभार ग्रहण नहीं किया है। राजभवन ने 28 जून को उनकी नियुक्ति की थी और निर्देश दिया था कि वे एक सप्ताह के भीतर योगदान दें। इसके बावजूद अब तक दोनों विश्वविद्यालयों में उनकी उपस्थिति नहीं हुई है। लोकपाल का पद छात्रों की शिकायतों और समस्याओं के समाधान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। नियुक्ति के बावजूद पदभार नहीं संभालने से विद्यार्थियों को अपनी शिकायतें दर्ज कराने में परेशानी हो रही है। विश्वविद्यालय स्तर पर भी इस मामले में स्थिति स्पष्ट नहीं है। छात्रों का कहना है कि लोकपाल की अनुपस्थिति में उनकी शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
विवि में क्यों जरूरी है लोकपाल
:: यूजीसी के नियमानुसार, विवि की छात्र शिकायत निवारण समिति से न्याय न मिलने पर लोकपाल अंतिम व निष्पक्ष न्यायिक मंच होता है।
:: यह विवि के किसी दबाव में काम नहीं करता, क्योंकि इस पद पर सेवानिवृत्त कुलपति, 10 वर्षों के कार्यानुभव वाले सेवानिवृत्त प्रोफेसर या पूर्व जिला जज ही नियुक्त होते हैं।
:: किसी भी छात्र की शिकायत प्रशासनिक लापरवाही के कारण विवि की फाइलों में दब न जाए, यह सुनिश्चित करना लोकपाल का मुख्य कार्य है।
लोकपाल का पद खाली होने से छात्रों से जुड़े कई अहम मामले अधर में लटके हैं:
: रिजल्ट जारी होने में देरी या डिग्री अवॉर्ड से जुड़ी तकनीकी परेशानियां।
: तय फीस से अधिक वसूली, शुल्क वापसी या फीस निर्धारण से जुड़े विवाद।
: निर्धारित नियमों की अनदेखी कर एडमिशन की प्रक्रिया संचालित करने के मामले।
: छात्रवृत्ति व वित्तीय सहायता से वंचित रखने और परीक्षा-मूल्यांकन में अनियमितताएं।
: आरक्षित या विशेष श्रेणियों के विद्यार्थियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव।
लोकपाल के योगदान नहीं देने पर राजभवन को दे चुके हैं जानकारी, नए सिरे से नियुक्ति की तैयारी
कोल्हान विश्वविद्यालय और जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय ने लोकपाल के पद पर नियुक्त प्रोफेसर टी.आर. थापक के योगदान नहीं देने की जानकारी राजभवन को दे दी है। कोल्हान विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने बताया कि यूजीसी के मानकों और छात्रों के हितों को देखते हुए नए लोकपाल की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी है। वहीं, जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी मामले की समीक्षा की बात कही है। विश्वविद्यालय के प्रवक्ता के अनुसार, छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था जरूरी है। सक्षम प्राधिकार से समन्वय कर रिक्त पद भरने की दिशा में कदम उठाया जाएगा। दोनों विश्वविद्यालयों ने कहा कि इस संबंध में राजभवन को जानकारी दी जा चुकी है।

