
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 13 साल पहले हुई एक हत्या के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 88 वर्षीय बुजुर्ग को रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने पाया कि पिता और बेटे के बीच शराब पीने को लेकर हुए विवाद के दौरान गुस्से में चाकू का एक ही वार किया गया था। घटना अचानक हुई थी और हमले के पीछे पूर्व नियोजित योजना के प्रमाण नहीं मिले। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने अपराध को हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में माना।
न्यायमूर्ति आनन्दा सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने गोमा गोप की अपील पर सुनवाई करते हुए उनकी सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 से बदलकर धारा 304 के भाग-2 के तहत कर दी। अदालत ने बुजुर्ग की उम्र और पहले से जेल में बिताई गई अवधि को ध्यान में रखते हुए उनकी सजा को अब तक काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया। इस आदेश के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया।
झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: अचानक हुए विवाद में एक वार को माना गैर-इरादतन हत्या
हाईकोर्ट पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा स्थित तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत के 24 अगस्त 2018 के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई कर रहा था। निचली अदालत ने गोमा गोप को हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
मामले में अदालत ने घटना की परिस्थितियों, गवाहों के बयानों और चिकित्सकीय साक्ष्यों का परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पिता और बेटे के बीच विवाद अचानक शुरू हुआ था। गुस्से में आकर पिता ने सब्जी काटने वाले चाकू से बेटे पर एक वार किया। हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद-4 के तहत विचार योग्य माना। इस प्रावधान के अनुसार, निर्धारित परिस्थितियों में अचानक हुए झगड़े के दौरान बिना पूर्व योजना के किया गया घातक हमला हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में आ सकता है।
शराब पीने को लेकर पिता-पुत्र में हुआ था विवाद
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 21 नवंबर 2013 की है। उस दिन गोमा गोप अपने घर में स्थानीय रूप से तैयार हड़िया पी रहे थे। इसी दौरान उनका 20 वर्षीय बेटा प्रताप गोप घर पहुंचा। उसने पिता को अधिक शराब पीने को लेकर टोका, जिसके बाद दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई।
विवाद बढ़ने पर गोमा गोप ने सब्जी काटने वाला चाकू उठाकर बेटे के पेट में घोंप दिया। हमले में प्रताप की आंतें बाहर आ गईं और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के समय आरोपी की पत्नी और मृतक की मां जेमा गोप घर पर मौजूद थीं। उन्होंने घटना की सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया।
चिकित्सकीय साक्ष्य में सामने आया चाकू का एक ही वार
अपील की सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से उसे झूठा फंसाए जाने और लंबे समय से जेल में रहने की दलील दी गई। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से अभियोजन के पक्ष का समर्थन किया गया। सरकारी वकील ने घटनास्थल से खून से सनी मिट्टी और हथियार बरामद होने का हवाला देते हुए अपराध की पुष्टि करने की दलील दी।
हाईकोर्ट ने गवाहों और चिकित्सकीय रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद पाया कि मृतक को चाकू का केवल एक ही वार लगा था। घटना के समय पत्नी के अलावा कोई अन्य प्रत्यक्षदर्शी सामने नहीं आया था। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए माना कि विवाद अचानक भड़का और हमला पूर्व नियोजित नहीं था। इसी आधार पर मामले को हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में रखा गया।
88 साल की उम्र और लंबी कैद के आधार पर मिली राहत
सजा तय करते समय हाईकोर्ट ने गोमा गोप की उम्र और जेल में बिताई गई अवधि पर भी विचार किया। अदालत के अनुसार, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत बयान दर्ज किए जाने के समय उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। अब वह करीब 88 वर्ष के हो चुके हैं और लगभग 13 वर्षों से इस मामले की कानूनी प्रक्रिया तथा कैद का सामना कर रहे थे।

