
रांची: एक दौर था जब झारखंड के घने जंगलों में हर तरफ खौफ और सन्नाटे का पहरा हुआ करता था। पारसनाथ की पहाड़ियों से लेकर सारंडा के विशाल जंगलों तक आए दिन बम-धमाकों की आवाजें गूंजती थीं। बारूद का धुआं हवाओं में घुला रहता था और ग्रामीण डर के साए में जीने को मजबूर थे। लेकिन अब वो खौफनाक दिन पीछे छूट चुके हैं। सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और कड़ी मेहनत की बदौलत यह इलाका अब लाल आतंक (माओवाद) के चंगुल से पूरी तरह आजाद होने की कगार पर है।
इलाके में शांति बहाल होने के बाद अब सुरक्षा व्यवस्था के ढांचे में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। जिन अस्थाई सुरक्षा कैंपों में रहकर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया और दिन-रात पहरा दिया, अब वे कैंप धीरे-धीरे खाली किए जा रहे हैं। जवानों की कई बटालियनें अपने मिशन को पूरा कर अब दूसरे राज्यों और नई जिम्मेदारियों के लिए रवाना हो रही हैं।
खौफ के ठिकाने अब बनेंगे उम्मीद के केंद्र
प्रशासन ने खाली हो रहे इन जवानों के अड्डों को बेकार छोड़ने के बजाय, इन्हें गांव वालों के भले के लिए इस्तेमाल करने की एक बेहतरीन योजना बनाई है। अब इन कैंपों को ‘विकास केंद्रों’ के रूप में बदला जाएगा।
आने वाले समय में इन्हीं इमारतों और परिसरों के भीतर ग्रामीणों की सुविधा के लिए प्रज्ञा केंद्र (कॉमन सर्विस सेंटर) शुरू किए जाएंगे, ताकि लोगों को सरकारी योजनाओं के लिए दूर न भागना पड़े। स्वास्थ्य उपकेंद्र खुलेंगे, जिससे बीमार पड़ने पर तुरंत इलाज मिल सके।
स्कूल और पंचायत भवन बनाए जाएंगे, ताकि आने वाली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा और गांव को अपनी बात रखने का मंच मिले। इस योजना पर जिला पुलिस और जिला प्रशासन के बीच सहमति बन चुकी है और उच्च अधिकारियों को इसकी पूरी रूपरेखा भेज दी गई है। जल्द ही यह योजना जमीन पर उतरती हुई दिखाई देगी।
सारंडा और पारसनाथ में बदला माहौल
सारंडा के सुदूर और दुर्गम जंगलों में सीआरपीएफ के कम से कम पांच अस्थायी कैंप खाली कराए जा चुके हैं। ठीक इसी तरह पारसनाथ पहाड़ी और आसपास के इलाकों से भी सुरक्षा बलों की वापसी जारी है। बम विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में माओवादियों द्वारा छिपाकर रखे गए आईईडी (बम) भी समय के साथ अपने आप बेअसर हो जाएंगे, जिससे आने वाले दिनों में यह पूरा क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगा।
दर्शकों से बुनियादी सुविधाओं और विकास से कटे रहे इन आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में अब बदलाव की बयार बहने वाली है। सरकारी योजनाओं का लाभ सीधा उन तक पहुंचेगा, जिससे उनका जीवन स्तर बेहतर होगा।
दो दर्जन से ज्यादा कैंपों का होगा कायाकल्प
आने वाले समय में सारंडा और पारसनाथ इलाके से करीब दो दर्जन से अधिक सुरक्षा कैंप खाली होने की उम्मीद है। इन सभी जगहों को विकास गतिविधियों का केंद्र बनाया जाएगा। हालांकि, माओवादी दोबारा अपनी जड़ें न जमा सकें, इसके लिए पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहेगा। कुछ चुनिंदा बड़े कैंपों को टीओपी (टूरिस्ट आउटपोस्ट) या पुलिस ओपी (आउटपोस्ट) के रूप में बरकरार रखा जाएगा, ताकि इलाके में कानून और सुरक्षा का अहसास बना रहे। वर्षों की लंबी अंधेरी रात के बाद अब झारखंड के इन खूबसूरत जंगलों में तरक्की की नई सुबह हो चुकी है!
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