
रांची: झारखंड में अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पढ़ाने और स्कूलों को संभालने में बिताने वाले पारा शिक्षकों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। वर्षों तक शिक्षा की अलख जगाने वाले ये शिक्षक जब रिटायर होते हैं तो उनके हाथ खाली रहते हैं। इसी गंभीर मुद्दे को उठाते हुए झारखंड प्रदेश सहायक अध्यापक संघर्ष मोर्चा के नेता विनोद तिवारी ने राज्य सरकार से इन शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने की मांग की है।
विनोद तिवारी ने कहा कि पारा शिक्षकों को मौजूदा सरकार से बहुत उम्मीदें हैं। अपनी जवानी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में झोंक देने वाले शिक्षकों को रिटायरमेंट के बाद आर्थिक तंगी से जूझना पड़ता है। सरकार से मांग की है कि राज्य के हर सेवानिवृत्त सहायक अध्यापक को कम से कम पांच लाख रुपये की एकमुश्त आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए, ताकि वे बुढ़ापे में अपनी जरूरतें पूरी कर सकें।
10 करोड़ के कल्याण कोष का नहीं मिल रहा फायदा
सरकार की पुरानी योजनाओं पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के समय सहायक अध्यापकों के हित के लिए एक ‘कल्याण कोष’ बनाया गया था। इस कोष में करीब 10 करोड़ रुपये जमा किए गए थे। इसका उद्देश्य यह था कि रिटायर होने वाले और सेवा के दौरान जान गंवाने वाले शिक्षकों के परिवारों को जरूरत के वक्त आर्थिक मदद मिल सके। अफसोस की बात है कि इतना पैसा होने के बावजूद आज तक किसी भी जरूरतमंद शिक्षक या उनके परिवार को इस योजना का सही लाभ नहीं मिल पाया है।
मृत शिक्षकों के परिजनों को मिले अनुकंपा पर नौकरी
संघर्ष मोर्चा ने मृत पारा शिक्षकों के परिवारों का दर्द भी बयां किया। कहा कि जिन शिक्षकों की मौत सेवा के दौरान हो गई थी, उनके आश्रितों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का मामला काफी समय से लटका हुआ है। सरकार की ओर से कागजी प्रक्रिया पूरी करने के कई बार आश्वासन दिए गए। लेकिन धरातल पर अब तक किसी को नौकरी नहीं मिली। इससे उन परिवारों के सामने भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं।
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