रांची: झारखंड जैसे कृषि प्रधान राज्य में मानसूनी बारिश का घटता स्तर एक गंभीर जलवायु संकट का संकेत दे रहा है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में झारखंड की औसत मानसूनी बारिश में लगभग 69 मिमी की गिरावट दर्ज की गई है।

झारखंड में मानसूनी बारिश के आंकड़े (औसतन)
समयावधि औसत मानसूनी वर्षा (MM)
1951–2000 1091.9 MM
1961–2010 1054.7 MM
1971–2020 1022.9 MM
हर दशक में औसतन 33–37 मिमी की गिरावट दर्ज हो रही है।


बारिश नहीं तो खेती नहीं
झारखंड की खेती लगभग पूरी तरह मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में वर्षा में लगातार आ रही कमी से कृषि पर प्रभाव पड़ रहा है।
- धान जैसी खरीफ फसलों पर सीधा असर
- कृषक आय और उत्पादन में गिरावट
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट गहराने की आशंका क्या कहता है मौसम विभाग?
रांची मौसम केंद्र के निदेशक अभिषेक आनंद के अनुसार झारखंड में कम होती मानसूनी वर्षा जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। यह केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट है। उनके अनुसार, इस गिरावट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं।
-वन क्षेत्रों की गुणवत्ता में गिरावट
-मिट्टी का क्षरण
-अनियंत्रित शहरीकरण
-वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक प्रयोग
पलामू और गढ़वा क्यों हैं सबसे ज्यादा प्रभावित?
अभिषेक आनंद के मुताबिक पलामू और गढ़वा जैसे जिले Rain Shadow Zone में आते हैं। बिहार के कैमूर हिल्स की वजह से मानसूनी सिस्टम कमजोर हो जाता है।
राज्य के पूर्वी जिलों (जामताड़ा, पूर्वी सिंहभूम) में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा
-पश्चिमी जिलों में मानसून का असर कम
- जलवायु परिवर्तन का दीर्घकालिक प्रभाव
यह समस्या केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संकट, भूमि की उर्वरता में गिरावट, जैव विविधता पर प्रभाव, स्थानीय मौसम चक्र का विघटन आदि पर भी प्रभाव डालती है।
क्या है समाधान?
मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार कुछ उपायों द्वारा इसका समाधान किया जा सकता है।
- वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग
- वन क्षेत्र का संरक्षण और पुनर्वनीकरण
- जल संरक्षण अभियान
- मानसून आधारित कृषि योजना
- माइक्रो-इरिगेशन और ड्रिप सिंचाई तकनीक

