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Navratri Sixth Day 2026 : नवरात्रि का छठा दिन 2026: मां कात्यायनी की पूजा विधि, मंत्र, भोग, कथा और आरती, जानें शुभ रंग का महत्व

by Rakesh Pandey
Navratri Sixth Day 2026
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फीचर डेस्क :   शारदीय नवरात्रि में छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। देवी कात्यायनी को साहस, शक्ति और अधर्म पर विजय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की आराधना करने से भक्तों को भय और जीवन की बाधाओं से लड़ने की शक्ति मिलती है। विवाह में आने वाली अड़चनों को दूर करने की कामना से भी इस दिन देवी की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि के छठे दिन भक्त विधि-विधान से पूजा करते हैं और मां को प्रिय फूल, फल तथा भोग अर्पित कर सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इस दिन शहद का भोग लगाने का विशेष महत्व बताया गया है। आइए जानते हैं नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा विधि, स्वरूप, प्रिय भोग, मंत्र, पौराणिक कथा और आरती से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें।

नवरात्रि का छठा दिन 2026: मां कात्यायनी की पूजा का महत्व

मां कात्यायनी नवदुर्गा का छठा स्वरूप हैं। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें पराक्रम, आत्मविश्वास और नकारात्मक शक्तियों पर विजय दिलाने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त नवरात्रि के छठे दिन मां की आराधना करके परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता की कामना करते हैं। मां कात्यायनी की उपासना का संबंध विवाह संबंधी मनोकामनाओं से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक देवी की पूजा करने से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना की जाती है।

मां कात्यायनी का स्वरूप कैसा है?

मां कात्यायनी सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी चार भुजाएं हैं। उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कमल का फूल सुशोभित रहता है। अन्य दो हाथ अभय मुद्रा और वर मुद्रा में होते हैं। अभय मुद्रा निर्भयता का प्रतीक है, जबकि वर मुद्रा भक्तों को आशीर्वाद देने का संकेत मानी जाती है। देवी का तेजस्वी स्वरूप साहस, आत्मबल और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी की आराधना से भक्तों को कठिन परिस्थितियों का सामना करने का संबल मिलता है।

मां कात्यायनी की पूजा विधि

नवरात्रि के छठे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा शुरू करने से पहले दीपक जलाएं और मां का ध्यान करते हुए पूजा का संकल्प लें। इसके बाद देवी को गंगाजल अर्पित करें। धार्मिक परंपरा के अनुसार, मां कात्यायनी को पीले वस्त्र अर्पित किए जा सकते हैं।

पूजा के दौरान मां को रोली, चंदन, कुमकुम, अक्षत, फल और मिठाई चढ़ाएं। देवी को लाल गुलाब या गुड़हल के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाएं और श्रद्धापूर्वक उनके मंत्र का जाप करें। पूजा के अंत में मां की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा मंगल की कामना करें। पूजा करते समय स्वच्छता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखें।

मां कात्यायनी का प्रिय भोग क्या है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी को शहद प्रिय है। इसलिए नवरात्रि के छठे दिन देवी को शहद का भोग लगाने की परंपरा है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार हलवा, मिठाई, गुड़ और अन्य मीठे पकवान भी अर्पित कर सकते हैं। भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है। पूजा में भोग का महत्व देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण से जुड़ा माना जाता है।

मां कात्यायनी का मंत्र

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा के दौरान उनके मंत्र का जाप किया जाता है। भक्त इस मंत्र का उच्चारण करके देवी से सुख, शांति और बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।

मंत्र:

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

इस मंत्र का जाप पूजा के दौरान श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। भक्त अपनी परंपरा के अनुसार मंत्र का जाप करके मां का ध्यान करते हैं।

मां कात्यायनी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन मां भगवती के परम भक्त थे। उन्होंने देवी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। मान्यता है कि मां कात्यायनी का प्राकट्य देवताओं की सामूहिक शक्ति से हुआ था।

उस समय महिषासुर नामक असुर के अत्याचारों से देवता परेशान थे। उसे पराजित करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित विभिन्न देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। देवी ने महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया और महिषासुर के विरुद्ध युद्ध किया। इसी कारण मां कात्यायनी को शक्ति और पराक्रम की देवी के रूप में पूजा जाता है।

कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों पर विशेष पूजा की थी। इसके बाद दशमी तिथि पर देवी ने महिषासुर का वध कर दिया। महिषासुर पर विजय के कारण मां दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। यह कथा अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है।

मां कात्यायनी की आरती

नवरात्रि के छठे दिन पूजा संपन्न करने के बाद मां कात्यायनी की आरती करने की परंपरा है। भक्त देवी के समक्ष दीपक जलाकर आरती करते हैं और परिवार की खुशहाली तथा मंगल की कामना करते हैं। आरती के दौरान मां के शक्ति स्वरूप का स्मरण किया जाता है।

जय-जय मां कात्यायनी, जय दुर्गा महारानी।

आरती करते समय भक्त अपनी परंपरा के अनुसार मां कात्यायनी की प्रचलित आरती का गायन कर सकते हैं। इसके बाद देवी को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

मां कात्यायनी की पूजा में किन बातों का ध्यान रखें?

नवरात्रि के छठे दिन पूजा करते समय पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और देवी को श्रद्धापूर्वक पुष्प तथा भोग अर्पित करें। मंत्र जाप और आरती के दौरान मन को एकाग्र रखें। मां कात्यायनी की पूजा में लाल फूल और शहद का भोग विशेष रूप से प्रचलित हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवी की आराधना साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मकता की कामना के साथ की जाती है।

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