चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम के घने सारंडा जंगल में बसे 10 वैध वन ग्राम आज भी सरकारी उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हैं। दशकों से इन गांवों को राजस्व ग्राम में बदलने की मांग उठ रही है, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने से हजारों आदिवासी ग्रामीण मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं।
झारखंड में कुल 14 वैध वन ग्राम, 10 गांव अकेले सारंडा क्षेत्र में स्थित
जानकारी के अनुसार ये सभी वन ग्राम 1905 से 1927 के बीच वन विभाग द्वारा जंगल संरक्षण के उद्देश्य से बसाए गए थे। जनजातीय कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में कुल 14 वैध वन ग्राम हैं, जिनमें से 10 गांव अकेले सारंडा क्षेत्र में स्थित हैं। इसके बावजूद इन्हें आज तक राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं मिला है। मनोहरपुर प्रखंड के थोलकोबाद, तिरिलपोसी, नयागांव, दीघा, बिटकिलसोया, बलिबा और कुमडी तथा नोवामुंडी प्रखंड के करमपदा, नवागांव और भनगांव के ग्रामीण लंबे समय से अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने सरकार पर लगाया आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार चुनाव के समय बड़े वादे करती है, लेकिन बाद में मामला फाइलों में दबा दिया जाता है। स्थिति यह है कि यहां के लोगों को जाति, आवासीय और अन्य जरूरी प्रमाण पत्र बनवाने में भारी परेशानी हो रही है। वर्ष 1991-92 में रैयती खतियान मिलने के बावजूद आज तक मालगुजारी रसीद नहीं काटी जाती। वहीं मुंडा, डाकुआ और दिउरी जैसे पारंपरिक पदाधिकारियों को भी सरकारी मानदेय नहीं मिलता।
सारंडा क्षेत्र खनिज संपदा से समृद्ध है, यहां से सरकार को मिलता भारी राजस्व
ग्रामीणों का कहना है कि सारंडा क्षेत्र खनिज संपदा से समृद्ध है और यहां से सरकार को भारी राजस्व मिलता है, लेकिन मूल निवासियों को उनके अधिकार नहीं मिल रहे। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इन वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित नहीं किया गया, तो वे व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

