धनबाद : झारखंड सरकार के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने राज्यसभा चुनाव पर शनिवार को बड़ी बात कह दी। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी खरीद-फरोख्त की राजनीति करती है। राज्य में चल रहे भाषा विवाद पर कहा कि यह विवाद नहीं बल्कि एक चूक है, जिसे सुधारने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उच्च स्तरीय समिति गठित की है।
सर्किट हाउस में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। इसके बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने राज्यसभा चुनाव एवं भाषा विवाद पर खुलकर बातें कीं।
चुनाव जीतने के लिए भाजपा के पास आवश्यक संख्या बल नहीं
झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर वित्त मंत्री ने कहा कि भाजपा के पास राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए आवश्यक संख्या बल नहीं है, इसके बावजूद उम्मीदवार उतारने की तैयारी यह संकेत देती है कि वह विधायकों की खरीद-फरोख्त की राजनीति करना चाहती है।
मंत्री ने दावा किया कि महागठबंधन के पास कुल 56 विधायकों का समर्थन है, जिसमें झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दल शामिल हैं। एक सीट जीतने के लिए 28 वोटों की जरूरत होती है और महागठबंधन की स्थिति पूरी तरह मजबूत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारेगी, हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी आलाकमान को करना है।
भाषा को ले विवाद नहीं, बल्कि एक चूक है
झारखंड में चल रहे भाषा विवाद पर उन्होंने कहा कि यह विवाद नहीं है। यह मात्र एक चूक है, जिसे सुधारने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने समिति बना दी है। उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान मिलना चाहिए और इसके लिए नियमावली में आवश्यक संशोधन की जरूरत है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और उनके बीच कथित खींचतान के सवाल पर उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट की। कहा कि उनका प्रदेश अध्यक्ष के साथ कोई व्यक्तिगत विवाद नहीं है। मतभेद केवल पार्टी की नीतियों और सिद्धांतों को लेकर है, किसी व्यक्ति विशेष को लेकर नहीं।
वहीं झारखंड में भाषा नियमावली को लेकर चल रहे विवाद पर वित्त मंत्री ने कहा कि इसे विवाद कहना उचित नहीं होगा, बल्कि इसमें कुछ चूक हुई है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस विषय पर उच्च स्तरीय समिति गठित की है, जिसकी बैठक तीन जून को प्रस्तावित है।
इन भाषाओं को भी मिलना चाहिए सम्मान
मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि बिहार से सटे झारखंड के कई जिलों में भोजपुरी, मैथिली और अंगिका जैसी भाषाएं व्यापक रूप से बोली जाती हैं। ऐसे में इन भाषाओं का भी सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनजातीय भाषाओं का सम्मान सभी करते हैं, लेकिन जिन क्षेत्रों में जनजातीय भाषा बोलने वाले नहीं हैं, जहां उस भाषा में पढ़ाई नहीं होती और न ही शिक्षक उपलब्ध हैं। वहां उसे अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकार से उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि नियमावली में सभी भाषाओं को समुचित स्थान दिया जाए, ताकि किसी भी वर्ग के विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित न हो।
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