
रांची : झारखंड सरकार के पथ निर्माण विभाग का एडवांस प्लानिंग विंग करीब 25 साल पुराने ढर्रे पर चल रहा है। राज्य गठन के बाद सड़क और पुल निर्माण की योजनाओं में कई गुना बढ़ोतरी के बावजूद अब तक इस विंग का पुनर्गठन नहीं किया गया। इसका असर यह है कि सड़क-पुल योजनाओं के डीपीआर, सर्वे और टेस्टिंग के लिए विभाग को निजी कंसल्टेंट कंपनियों की मदद लेनी पड़ रही है।
हाल के दिनों में कई सड़क और पुल योजनाओं के डीपीआर कंसल्टेंट कंपनियों के माध्यम से तैयार कराये गये हैं। इसके लिए विभाग को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में दो अलग-अलग पत्रों के माध्यम से डीपीआर और टेस्टिंग कार्य के लिए 5.86 करोड़ रुपये और 6.59 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गयी। इसके अलावा भी पुलों के डीपीआर और टेस्टिंग के लिए बड़ी राशि स्वीकृत की गयी है। इस मद में वित्तीय वर्ष 26- 27 में भी बड़ी राशि खर्च की जा रही है।
चार डिवीजन में सीमित संख्या में इंजीनियर
एडवांस प्लानिंग विंग के अधीन दो फील्ड सर्वे डिवीजन, एक मिट्टी जांच प्रमंडल और एक प्लानिंग एंड इन्वेस्टिगेशन डिवीजन है। इन चारों डिवीजन में करीब चार कार्यपालक अभियंता, 37 सहायक अभियंता और 36 कनीय अभियंता कार्यरत हैं। यह ढांचा करीब 25 वर्ष पुराना है और अब तक इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।
वर्तमान में यहां कार्यरत इंजीनियरों के वेतन पर हर महीने करीब 70 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद विभाग को डीपीआर और तकनीकी कार्यों के लिए बाहरी एजेंसियों की मदद लेनी पड़ रही है। योजनाओं की संख्या के मुकाबले इंजीनियरों की संख्या कम होना, आधुनिक तकनीक का पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिलना और समय पर डीपीआर तैयार करने का दबाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
सीडीओ करता है अंतिम तकनीकी जांच
पथ निर्माण विभाग के अधीन सेंट्रल डिजाइन ऑर्गेनाइजेशन (सीडीओ) भी है। इसमें विशेषज्ञ इंजीनियर कार्यरत हैं, जो योजनाओं को अंतिम तकनीकी स्वीकृति देते हैं। एडवांस प्लानिंग विंग के इंजीनियर जिन योजनाओं का डीपीआर विभागीय स्तर पर तैयार करते हैं, उसे सीडीओ भेजा जाता है। कंसल्टेंट कंपनियों से तैयार डीपीआर की भी सीडीओ स्तर पर तकनीकी जांच होती है।
चार की जगह 12 विंग बनाने की जरूरत
इंजीनियरों को कहना है कि वर्तमान चार दिन की जगह कम से कम 12 को भी होना चाहिए ताकि सड़क पुल का डिजाइन बेहतर तरीके से करायाजा सके। इसके अलावा सड़क पुल के भी अलग-अलग डिवीजन होनी चाहिए। एकीकृत बिहार में सड़क और पुल के लिए अलग-अलग डिवीजन की व्यवस्था थी। विभागीय ढांचे को मजबूत करने पर इंजीनियर खुद डीपीआर, डिजाइन और प्लान तैयार कर सकेंगे और निजी कंसल्टेंट कंपनियों पर निर्भरता कम होगी।

