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Jharkhand News: राष्ट्रीय आंदोलन को भारतेंदु साहित्य से मिला वैचारिक दिशा-निर्देश, LBSM कॉलेज में साहित्य उत्सव का आयोजन

by Kanchan Kumar
Bharatendu Sahitya Utsav Jamshedpur
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जमशेदपुर : भारतेंदु हिंदी साहित्य के मसीहा थे। उन्होंने रीतिकालीन श्रृंगारिक रचनाओं से हिंदी साहित्य को बाहर लाया। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को भारतेंदु साहित्य से वैचारिक दिशा-निर्देश मिला। उन्होंने स्थिर पानी में पत्थर फेंककर लहरें पैदा करने का काम किया। साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय चेतना के विकास के साथ-सामाजिक रुढ़ियों व कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने हिंदी के सहज-सरल रूप का विकास किया।

यह बातें डॉ. अशोक कुमार झा’ अविचल’ने कहीं। वे शुक्रवार को एलबीएसएम कॉलेज के बहुउद्देश्यीय सभागार में चार सत्रों में आयोजित ‘भारतेंदु साहित्य उत्सव’ कार्यक्रम को बोधित कर रहे थे। यह उत्सव अखिल भारतीय साहित्य परिषद, झारखंड और साहित्य कला परिषद, एलबीएसएम कॉलेज द्वारा आयोजित किया गया था।

भारतेंदु अपने समय से आगे थे : वैभव मणि

भारतेंदु के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ इस समारोह के उद्‌घाटन सत्र की शुरुआत हुई। इस सत्र के मुख्य अतिथि वैभव मणि त्रिपाठी ने कहा कि भारतेंदु अपने समय से आगे थे। वे 35 साल की अल्पायु में चले गए। उन्होंने अंगरेजी राज की बुराइयों के खिलाफ लिखा। हिंदी को राष्ट्रीय स्तर की भाषा बनाया । कवि डोबराली हो ने भारतेंदु के सामाजिक- सांस्कृतिक योगदान की चर्चा की। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, झारखंड प्रांत के अध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि भारतेंदु के राष्ट्रबोध को आत्मसात करने की जरूरत है। अतिथियों का अंगवस्त्र प्रदान कर भावभीना स्वागत एवं सम्मान किया गया। कॉमर्स विभागाध्यक्ष डॉ. विजय प्रकाश ने स्वागत भाषण किया। इस सत्र के समन्वयक डॉ. विनय कुमार गुप्ता थे।

दूसरा सत्र लोकार्पण और भारतेंदु रत्न सम्मान का था। जिसका संचालन प्रो० बिनोद कुमार द्वारा किया गया।

पुस्तक लोकार्पण एवं लेखक

कार्यक्रम के दौरान मूर्धन्य साहित्यकारों एवं विद्वानों की उपस्थिति में निम्नलिखित कृतियों का विधिवत अनावरण किया गया:

‘कानन दीप’ (एलबीएसएम, महाविद्यालय, कॉलेज पत्रिका): विद्यार्थियों की मौलिक अभिव्यक्ति, शोध-दृष्टि और सृजनशीलता का अनुपम दस्तावेज है।

‘स्वयं की तलाश’ सोनम झा द्वारा रचित काव्य संग्रह है जिसमें मानवीय संवेदनाओं, आत्म-बोध और जीवन के गूढ़ दर्शन को शब्द देती एक स्पंदनशील काव्य-यात्रा का साक्ष्य है।

‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ डॉ. संतोष द्वारा रचित भारत की प्राचीन एवं शाश्वत बौद्धिक परंपराओं, दर्शन और ज्ञान-मीमांसा को आधुनिक संदर्भों में विश्लेषित करती एक महत्त्वपूर्ण कृति है।

‘नीम तले बुझती लौ’ रचना झा द्वारा रचित काव्य संग्रह है जिसमें आंचलिक यथार्थ, सामाजिक सरोकारों और मानवीय जीवन के संघर्षपूर्ण धरातल को उकेरती एक संवेदनसिक्त रचना है।
‘झारखण्डक कथा परिवेश’ (अनुवाद) मैथिली के विद्वान डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ की पुस्तक है जिसमें झारखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति, जनजीवन और कथा-आख्यानों को नई भाषाई परिधि प्रदान करने वाला अनूठा अनुवादकीय उपक्रम किया गया है।

भारतेंदु साहित्य रत्न सम्मान

मातृभाषा और उसके साहित्य के संवर्धन के लिए समर्पित डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल'(जमशेदपुर) को अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा प्रतिष्ठित ‘भारतेंदु साहित्य रत्न’ से अलंकृत किया गया है। यह सम्मान केवल एक उपलब्धि मात्र नहीं, बल्कि मातृभाषा की सेवा में उनके चिंतन, लेखन और अटूट निष्ठा का देदीप्यमान प्रमाण है। इनके अलावा यह पुरस्कार डॉ. राजश्री जयंती (रांची) तथा डॉ० विजय शंकर (देवघर) को भी दिया गया।

भारतेंदु साहित्य और आनंदमठ पर विचारोत्तेजक विमर्श

तीसरा सत्र भारतेंदु के साहित्य पर विमर्श का था। ‘भारतेंदुकालीन भारत’ पर बोलते हुए उन्होंने यह विश्वास दिलाया कि भारत के भाग्य को संघर्ष के जरिए बदला जा सकता है। वे युग प्रवर्तक साहित्यकार थे। राष्ट्रीय मुक्ति और सामाजिक परिवर्तन की जो बेचैनी थी, उसे उन्होंने अभिव्यक्ति दी।

राष्ट्र‌वाद के प्रसंग में ही ‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर आनंद‌मठ का प्रभाव’ विषय पर बोलते हुए प्रसेनजीत तिवारी ने कहा कि विचारधारा अपने आप में मजहब होता है। ‘ वंदे मातरम’ के कारण बंगाल विभाजन रुक गया। आनंदमठ’ ने राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। राष्ट्रवाद विभाजनकारी विचारों का विरोध करता है। राज श्री जयंती ने कहा कि ‘आनंदमठ’ में विकसित राष्ट्रीय चेतना है। इस‌का मूल संदेश है कि राष्ट्र ही सर्वोपरि है।

‘भारतेंदु साहित्य में भाषा संस्कृति’ पर बोलते हुए हिंदी विभाग, कोल्हान वि० वि० के पूर्व अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि भारतेंदु ने समावेशी संस्कृति की बात की। उन्होंने मध्यकालीन जड़ता, अंधविश्वास, सामंती दृष्टि, मानसिक दासता और साम्राज्यवाद का विरोध किया। उन्होंने हिंदी को राष्ट्र की संपर्क भाषा बनाया। वे वैचारिक रूप से अत्यंत जागरूक थे। भारत जिसके भीतर कई देश थे, उसे एक राष्ट्र बनाने का कार्य किया। इस सत्र के समन्वयक डॉ. सुधीर कुमार थे।

काव्यमयी संध्या के साथ उत्सव का समापन

विभिन्न शहरों के चालीस कवियों ने कविताओं का पाठ किया। अंतिम सत्र काव्य पाठ का था; जिसमें डोबराली हो, जोबा मुर्मू, लक्ष्मण प्रसाद, नूतन झा, संध्या सिन्हा, रचना झा, भानु प्रताप सिंह, सोनम झा आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समन्वयक सूरज सिंह राजपूत थे। रांची, आरा, देवघर, पलामू, धनबाद, जमशेदपुर के लगभग चालीस कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। तीसरे और अंतिम सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मौसुमी पॉल ने किया।

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