
Garhwa : झारखंड में हाथियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पश्चिमी सिंहभूम में तीन दिन पहले एक गर्भवती हथिनी की मौत के बाद अब गढ़वा जिले के रंका थाना क्षेत्र में एक जंगली हाथी मृत मिला है। विश्रामपुर गांव के पिपरादादर टोला में जंगल से सटे इलाके में रविवार देर रात हाथी का शव मिलने से वन विभाग में हड़कंप मच गया। घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी।
गढ़वा दक्षिणी वन प्रमंडल पदाधिकारी एबिन बेनी अब्राहम ने बताया कि सोमवार सुबह करीब आठ बजे विभाग को पिपरादादर टोला में जंगल के किनारे जंगली हाथी के मृत पड़े होने की सूचना मिली थी। इसके बाद अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम को तत्काल घटनास्थल पर भेजा गया। उन्होंने कहा कि फिलहाल हाथी की मौत के कारणों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकेगा।
घटनास्थल पर वन विभाग के अधिकारी ललन कुमार समेत अन्य कर्मचारी भी पहुंचे। टीम ने आसपास के इलाके का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों से भी जानकारी जुटाई। विभाग इस बात की जांच कर रहा है कि हाथी की मौत किन परिस्थितियों में हुई।
पहले भी हो चुकी है हाथियों की मौत
विश्रामपुर पंचायत क्षेत्र में हाथियों की मौत का यह पहला मामला नहीं है। वर्ष 2019 में नया टोला इलाके में एक जंगली हाथी की करंट की चपेट में आने से मौत हुई थी। वहीं अगस्त 2023 में भौंरी गांव में जंगल के किनारे एक शावक हाथी भी मृत मिला था।
लगातार हाथियों की मौत की घटनाओं ने क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रंका और आसपास के जंगलों में हाथियों के झुंड अक्सर गांवों और खेतों की ओर पहुंच जाते हैं। इससे मक्का, धान और अन्य फसलों को नुकसान होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
जंगल और गांवों के बीच बढ़ता टकराव
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले रास्तों के आसपास समय के साथ बस्तियां और खेती का विस्तार हुआ है। इससे हाथियों के पुराने रास्ते प्रभावित हुए हैं। हाथी जब इन्हीं रास्तों से गुजरते हुए खेतों या बस्तियों तक पहुंचते हैं तो ग्रामीणों और हाथियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है।
फसल और संपत्ति के नुकसान से ग्रामीणों को आर्थिक परेशानी भी उठानी पड़ती है। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों से हुए नुकसान का उचित मुआवजा पाने में भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा है।
संरक्षण के लिए ठोस योजना की मांग
ग्रामीणों ने हाथियों और इंसानों दोनों की सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि हाथियों के गांव में पहुंचने के बाद उन्हें भगाने के बजाय उनके पारंपरिक कॉरिडोर को चिन्हित कर सुरक्षित किया जाना चाहिए।
इसके अलावा जंगल के आसपास बिजली के तारों और अन्य संभावित खतरनाक स्थानों की नियमित जांच, हाथियों की आवाजाही पर निगरानी और ग्रामीणों को समय रहते सूचना देने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।
फिलहाल पिपरादादर जंगल में मिले हाथी के शव की जांच जारी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि हाथी की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई या इसके पीछे कोई अन्य वजह थी। घटना के बाद आसपास के ग्रामीणों में भी चिंता है कि हाथियों का झुंड दोबारा गांव की ओर आ सकता है।
Read Also: Gaurav Agarwal Topper: पिता की राशन दुकान, बेटे ने टॉपर बन रोशन किया नाम

